NCERT Class 9 Sanskrit Chapter 8 Annad Anandam Prati (Explanation & Solutions)

अष्टमः पाठः: अन्नाद् आनन्दप्रति

(तैत्तिरीयोपनिषद् - भृगुवरुणसंवादः)
भूमिका (परिचय)
संस्कृतवाङ्मये उपनिषत्-साहित्यस्य विशिष्टं महत्त्वपूर्णं च स्थानम् अस्ति। उपनिषत्सु अनेके ज्ञानप्रदाः संवादाः सन्ति। तैत्तिरीयोपनिषदि समग्रजीवनविकासाय पञ्चकोषाणां महत्त्वं पितापुत्रसंवादरूपेण वर्णितम्। तादृशज्ञानप्रदसंवादानाम् अध्ययनेन बोधनेन च वयम् आत्मविकासं कर्तुं शक्नुमः। अस्मिन् पाठे वयम् पितापुत्रयोः भृगुवरुणयोः संवादं पठिष्यामः।
हिंदी अर्थ: संस्कृत साहित्य में उपनिषद्-साहित्य का विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान है। उपनिषदों में ज्ञान देने वाले अनेक संवाद हैं। तैत्तिरीय उपनिषद में संपूर्ण जीवन-विकास के लिए पाँच कोषों का महत्व पिता-पुत्र के संवाद के रूप में बताया गया है। ऐसे ज्ञानप्रद संवादों के अध्ययन और बोध से हम आत्म-विकास कर सकते हैं। इस पाठ में हम पिता-पुत्र भृगु और वरुण के संवाद को पढ़ेंगे।
भाग 1: भृगु का प्रश्न
(एकदा ब्रह्मज्ञानाय तत्परः वरुणस्य पुत्रः भृगुः सविनयं पितरं प्रति गत्वा निवेदयति)

भृगुः: अयि भोः पितः! अभिवादयेऽहं सादरम्। भगवन्! ब्रह्मविषये मयि काचिद् जिज्ञासा वर्तते। किं तद् ब्रह्म येन सर्वं जगदिदं सञ्चात्यते? कृपया उपदिशत्।

वरुणः: पुत्र! शुभं भूयात्। ब्रह्मज्ञानाय त्वया स्वयमेव अन्वेषणं क्रियताम्। यत्नः अभ्यासश्च क्रियेताम्। तपस्तप्यताम्। तपसैव ज्ञायते।
हिंदी अर्थ: (एक बार ब्रह्मज्ञान के लिए तत्पर वरुण के पुत्र भृगु ने विनम्रतापूर्वक पिता के पास जाकर निवेदन किया) हे पिताजी! मैं आपको आदरपूर्वक प्रणाम करता हूँ। भगवन्! ब्रह्म के विषय में मेरे मन में कुछ जिज्ञासा है। वह ब्रह्म क्या है जिससे यह सारा जगत् व्याप्त है? कृपया उपदेश दीजिए। वरुण ने कहा— पुत्र! तुम्हारा कल्याण हो। ब्रह्मज्ञान के लिए तुम स्वयं ही खोज करो। प्रयत्न और अभ्यास करो। तपस्या करो। तप से ही (ब्रह्म) जाना जाता है।
शब्द (Word) हिन्दी अर्थ संस्कृत पर्याय English
अन्वेष्टव्यम्खोज करनी चाहिएअनुसन्धेयम्Explore
उदीरितम्कहा गयाउक्तम् / प्रकटितम्Spoken
प्रकटितम्प्रकट हुआप्रकाशितम्Revealed
श्रद्धानिष्ठाआदरःFaith
भाग 2: अन्नं ब्रह्म (पहला कोष - अन्नमय)
भृगुः: अस्तु तात!

(ततो भृगुः अनेकवर्षाणि तप आचरति। तपस्तप्त्वा पुनः पितरं निकषा गच्छति। पिता तं पृच्छति—)

वरुणः: अयि पुत्र! त्वया किं ज्ञातम्?

भृगुः: भोः पितः! अन्नं वै ब्रह्म इति।

वरुणः: कथम् अन्नं ब्रह्मरूपेण ज्ञातम्?

भृगुः: हे पितः! अन्नाद् एव प्राणिनः जायन्ते। अनेन एव प्राणिनः जीवन्ति। अनेनैव शरीरं बलं च वर्धते। अतोऽन्नं ब्रह्म इति उच्यते हि —

आहारात् सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते।
आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तवः॥


वरुणः: पुत्र! त्वया सम्यग् अवबुद्धम्। अत उच्यते— अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात् (अन्नं) सर्वौषधम् इति उच्यते। अतः कदापि अन्नं न निन्द्यात्। अन्नं सदा ईश्वरबुद्ध्या सेवेताम्। कदापि अन्नं न परिहर्तव्यम्। प्रयत्नेन अन्नं बहु कुर्वीत। सर्वदा सात्त्विकं हितकारकं च आहारं सेवेताम्। परं च हे वत्स! ब्रह्म ज्ञातुम् इतोऽपि यतताम्। तपः कुरुताम्।
हिंदी अर्थ: भृगु ने कहा— ठीक है पिताजी! (फिर भृगु ने कई वर्षों तक तपस्या की। तपस्या करके वे फिर पिता के पास गए। पिता ने उनसे पूछा) वरुण ने कहा— हे पुत्र! तुमने क्या जाना? भृगु ने कहा— हे पिताजी! **अन्न ही ब्रह्म है**। वरुण ने कहा— कैसे अन्न को ब्रह्म के रूप में जाना? भृगु ने कहा— हे पिताजी! अन्न से ही प्राणी उत्पन्न होते हैं। इसी से प्राणी जीवित रहते हैं। इसी से शरीर और बल बढ़ता है। इसलिए अन्न को ब्रह्म कहा जाता है। कहा भी है— हे राजन्! सभी प्राणी आहार से उत्पन्न होते हैं, आहार से ही बढ़ते हैं और उसी से जीवित रहते हैं। वरुण ने कहा— पुत्र! तुमने ठीक से समझा है। इसलिए कहा जाता है— अन्न प्राणियों में सबसे बड़ा (ज्येष्ठ) है। इसलिए (अन्न) को सभी औषधियों का रूप कहा जाता है। इसलिए कभी भी अन्न की निंदा नहीं करनी चाहिए। अन्न को सदा ईश्वर बुद्धि से ग्रहण करना चाहिए। कभी भी अन्न का त्याग नहीं करना चाहिए। प्रयत्नपूर्वक अन्न (का संग्रह) बहुत करना चाहिए। सदा सात्त्विक और हितकारक आहार ग्रहण करना चाहिए। और हे वत्स! ब्रह्म को जानने के लिए और भी प्रयत्न करो। तप करो।
शब्द (Word) हिन्दी अर्थ संस्कृत पर्याय English
परिहर्तव्यम्त्याग करना चाहिएत्यक्तव्यम्To be discarded
साधनीयम्संस्कार करना चाहिएसंस्करणीयम्Should be achieved
भूतानिप्राणी जनप्राणिनःLiving beings
कुर्वितकरना चाहिएकुर्यात्Should do
भाग 3: प्राणो वै ब्रह्म (दूसरा कोष - प्राणमय)
भृगुः: अस्तु तात!

(पुनः भृगुः पर्वतं गत्वा बहूनि वर्षाणि तप आचरति। तपस्तप्त्वा पितुः समीपं गच्छति। आगतं पुत्रं दृष्ट्वा पिता पृच्छति—)

वरुणः: हे पुत्र! तपसा त्वया किं ज्ञातम्?

भृगुः: हे पितः! प्राणो वै ब्रह्म इति।

वरुणः: हे भृगो! कथं प्राणो ब्रह्म इति ज्ञातम्?

भृगुः: हे भगवन्! प्राणो हि भूतानाम् आयुः। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। प्राण एव अस्माकं जीवनम्। प्राणेन विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति। अतः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च। तस्मात् प्राणो वै ब्रह्म इति विज्ञातम्।

वरुणः: पुत्र! त्वया सत्यम् उदीरितम्। प्राणाद् एव इमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणशक्त्या एव शारीरिकक्रियाशक्तेर्विकासो भवति। अत एव प्राणः सर्वथा रक्षणीयः। तस्मात् प्राणिविकासाय प्रतिदिनं प्राणायामः कर्तव्यः। उक्तं हि —

यावद् वायुः स्थितो देहे तावज्जीवनमुच्यते।
मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरोधयेत्॥


पुत्र! भवान् तपसा प्राणतत्त्वस्य महत्त्वं ज्ञातवान्। किन्तु ब्रह्मज्ञानाय इतोऽपि कठोरं तपः कुरुताम्।
हिंदी अर्थ: भृगु ने कहा— ठीक है पिताजी! (फिर भृगु पर्वत पर जाकर कई वर्षों तक तपस्या करते हैं। तपस्या करके पिता के पास जाते हैं। आए हुए पुत्र को देखकर पिता पूछते हैं) वरुण— हे पुत्र! तपस्या से तुमने क्या जाना? भृगु— हे पिताजी! **प्राण ही ब्रह्म है**। वरुण— हे भृगु! कैसे प्राण को ब्रह्म जाना? भृगु— हे भगवन्! प्राण ही प्राणियों की आयु है। प्राण में शरीर स्थित है। प्राण ही हमारा जीवन है। प्राण के बिना शरीर क्रियाशून्य हो जाता है। इसलिए प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। इसलिए प्राण ही ब्रह्म है, ऐसा जाना। वरुण— पुत्र! तुमने सत्य कहा है। प्राण से ही ये प्राणी उत्पन्न होते हैं। प्राण से उत्पन्न होकर जीवित रहते हैं। प्राणशक्ति से ही शारीरिक क्रियाशक्ति का विकास होता है। इसलिए प्राण की सर्वथा रक्षा करनी चाहिए। इसलिए प्राणियों के विकास के लिए प्रतिदिन प्राणायाम करना चाहिए। कहा भी है— जब तक शरीर में वायु स्थित है, तब तक जीवन कहा जाता है। उसका (शरीर से) निकलना मरण है, इसलिए वायु को रोकना चाहिए (प्राणायाम करना चाहिए)। पुत्र! तुमने तपस्या से प्राणतत्व का महत्व जान लिया। लेकिन ब्रह्मज्ञान के लिए और भी कठोर तप करो।
शब्द (Word) हिन्दी अर्थ संस्कृत पर्याय English
प्राणःप्राण वायुप्राणवायुःLife-breathe
निष्क्रान्तिःबाहर जानाबहिर्मिगमनम्Going out
विवर्धन्तेविशेष रूप से वृद्धि को प्राप्त होते हैंविशेषण वृद्धि प्राप्नुवन्तिGrow
हीःलज्जालज्जाModesty
भाग 4: मनो वै ब्रह्म (तीसरा कोष - मनोमय)
भृगुः: अस्तु पितः!

(सः पुनः बहुकालं यावद् वनं गत्वा तपश्चर्यां करोति। तपस्तप्त्वा प्रसन्नवदनो वरुणं निकषा प्राप्नोति, वरुणः भृगुं पृच्छति—)

वरुणः: हे पुत्र! त्वया तपसा किं ज्ञातम्?

भृगुः: हे तात! मया तपसा मनो वै ब्रह्म इति ज्ञातम्।

वरुणः: पुत्र! कथं मनो वै ब्रह्म इति?

भृगुः: हे पितः! मया तपसा एवम् अनुभूतं यद् अस्माकं मन एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्। समस्तानि इन्द्रियाणि अपि मनसा सञ्चाल्यन्ते। मानवः मनसा एव सर्वं कार्यं सम्पादयति। मनसः सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते। अतो मनो वै ब्रह्म इति।

वरुणः: हे वत्स! त्वया सम्यग् अनुभूतं यद् मन एव सर्वमिति। अत उपनिषदि उच्यते—

कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा।
धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत् सर्वं मन एव॥


वत्स! मानवः चिन्तनशक्त्या मननशक्त्या दृढसङ्कल्पशक्त्या च सर्वं लब्धुं शक्नोति। अतो मनसः शक्तिप्राप्तये मनः सदा सत्कर्मणा साधनीयम्। शोकादिरहितम्, उत्साहयुक्तं, शान्तं च करणीयम्। आहारशुद्धिश्च करणीया। किञ्च हे पुत्र! ब्रह्मज्ञानाय इतोऽपि प्रयतस्व।
हिंदी अर्थ: भृगु ने कहा— ठीक है पिताजी! (वे फिर बहुत समय तक वन में जाकर तपस्या करते हैं। तपस्या करके प्रसन्न मुख वाले भृगु वरुण के पास पहुँचते हैं, वरुण भृगु से पूछते हैं) वरुण— हे पुत्र! तुमने तपस्या से क्या जाना? भृगु— हे पिताजी! मैंने तपस्या से जाना कि **मन ही ब्रह्म है**। वरुण— पुत्र! कैसे मन ब्रह्म है? भृगु— हे पिताजी! मैंने तपस्या से ऐसा अनुभव किया कि हमारा मन ही सभी कर्मों का प्रवर्तक (चलाने वाला) है। सभी इन्द्रियाँ भी मन से ही संचालित होती हैं। मनुष्य मन से ही सारा कार्य करता है। मन से ही संकल्प, भाव और विचार उत्पन्न होते हैं। इसलिए मन ही ब्रह्म है। वरुण— हे वत्स! तुमने ठीक अनुभव किया कि मन ही सब कुछ है। इसलिए उपनिषद में कहा जाता है— इच्छा, संकल्प, संदेह, श्रद्धा, अश्रद्धा, धैर्य, अधैर्य, लज्जा, बुद्धि, भय— यह सब मन ही है। वत्स! मनुष्य चिन्तनशक्ति, मननशक्ति और दृढ़ संकल्पशक्ति से सब कुछ प्राप्त कर सकता है। इसलिए मन की शक्ति की प्राप्ति के लिए मन को सदा अच्छे कर्मों में लगाना चाहिए। उसे शोक आदि से रहित, उत्साहयुक्त और शांत करना चाहिए। आहार की शुद्धि भी करनी चाहिए। और हे पुत्र! ब्रह्मज्ञान के लिए और भी प्रयत्न करो।
शब्द (Word) हिन्दी अर्थ संस्कृत पर्याय English
कामःइच्छाइच्छाDesire
धृतिःधैर्यधैर्यम्Courage
धीःबुद्धिबुद्धिःIntelligence
विचिकित्सासंदेहसन्देहःDoubt
सङ्कल्पःसंकल्पप्रतिज्ञाCome into being
भाग 5: विज्ञानं वै ब्रह्म (चौथा कोष - विज्ञानमय)
भृगुः: अस्तु श्रीमन्!

(पुनः भृगुः बहुकालं यावत् कठोरं तपः कुरुते, तपः कृत्वा पितुः समीपं प्राप्नोति, पिता तं पृच्छति)

वरुणः: हे भृगो! तपसा किम् अनुभूतम्?

भृगुः: हे पितः! मया तपसा सूक्ष्मज्ञानेन च इदं ज्ञातं यद् विज्ञानं वै ब्रह्म इति।

वरुणः: पुत्र! किं नाम विज्ञानम्?

भृगुः: हे भगवन्! बुद्धितत्त्वमेव विज्ञानम्।

वरुणः: पुत्र! कथं विज्ञानं (बुद्धितत्त्वम्) ब्रह्म इति विज्ञातम्?

भृगुः: हे पितः! बुद्धितत्त्वं विना अस्माकं बोधशक्तेः, तर्कशक्तेः, विवेकशक्तेः, निर्णयशक्तेः, स्मृतिशक्तेश्च विकासो न भवित। बुद्धिरेव सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति। समग्रज्ञानं बुद्धौ एव विद्यते। अत एव विज्ञानं वै ब्रह्म इति।

वरुणः: पुत्र! सत्यं भाषसे। अतः बौद्धिकविकासाय विज्ञानमयकोषस्य विकासः कर्तव्यः। तदर्थं प्रतिदिनं ध्यानं योगासनं च कर्तव्यम्। किञ्च यदि ब्रह्मणः स्वरूपं वेतुम् इच्छति तर्हि इतोऽपि प्रयतताम्, अविव्यतां च।
हिंदी अर्थ: भृगु ने कहा— ठीक है श्रीमान्! (फिर भृगु बहुत समय तक कठोर तप करते हैं, तप करके पिता के पास पहुँचते हैं, पिता उनसे पूछते हैं) वरुण— हे भृगु! तपस्या से क्या अनुभव किया? भृगु— हे पिताजी! मैंने तपस्या और सूक्ष्म ज्ञान से यह जाना कि **विज्ञान (बुद्धि) ही ब्रह्म है**। वरुण— पुत्र! विज्ञान क्या है? भृगु— हे भगवन्! बुद्धि तत्व ही विज्ञान है। वरुण— पुत्र! कैसे विज्ञान (बुद्धि तत्व) को ब्रह्म जाना? भृगु— हे पिताजी! बुद्धि तत्व के बिना हमारी बोधशक्ति, तर्कशक्ति, विवेकशक्ति, निर्णयशक्ति और स्मृतिशक्ति का विकास नहीं होता। बुद्धि ही सारथी के रूप में हमें कर्मों में प्रवृत्त करती है। समग्र ज्ञान बुद्धि में ही है। इसलिए विज्ञान ही ब्रह्म है। वरुण— पुत्र! तुम सत्य बोल रहे हो। इसलिए बौद्धिक विकास के लिए विज्ञानमय कोष का विकास करना चाहिए। इसके लिए प्रतिदिन ध्यान और योगासन करना चाहिए। और यदि ब्रह्म का स्वरूप जानना चाहते हो, तो और भी प्रयत्न करो, और अधिक जानने की इच्छा करो।
शब्द (Word) हिन्दी अर्थ संस्कृत पर्याय English
विज्ञानम्बुद्धिबुद्धिःIntellect
अवबुद्धम्समझा गयाज्ञातम्Understood
अन्वेष्टव्यम्खोज करनी चाहिएअनुसन्धेयम्Explore
भाग 6: आनन्दो वै ब्रह्म (पाँचवाँ कोष - आनन्दमय)
भृगुः: अस्तु श्रीमन्! (भृगुः पुनः बहुकालं यावत् तपश्चर्यां करोति। तपस्तप्त्वा प्रसन्नमुखेन पितुः निकटे समुपस्थितो भवति।)

वरुणः: भोः वत्स! तपसा त्वया किं विज्ञातम्?

भृगुः: हे भगवन्! अत्यन्तं सूक्ष्मचिन्तनेन तपसा च मया एवम् अवबुद्धम् आनन्दो वै ब्रह्म इति।

वरुणः: हे पुत्र! कथम् आनन्दो वै ब्रह्म इति?

भृगुः: हे पितः! अस्माकं सर्वकर्माणि आनन्दाय भवन्ति। अस्माकं कर्मणो लक्ष्यम् आनन्दप्राप्तिरेव। आनन्देन एव प्राणिनो जीवन्ति। आनन्देन रहितं जीवनं मृत्युरूपमिति। तस्मात् आनन्दो वै ब्रह्म इति।

वरुणः: हे वत्स! त्वया सत्यं प्रकटितम्। अतः आनन्दप्राप्तये प्रतिदिनं ध्यानं योगासनं च कर्तव्यम्। प्राणिषु दया कर्तव्या। परोपकारः कर्तव्यः। रागः, द्वेषः, ईष्यां, क्रोधः, लोभः, मोहश्च हातव्याः। सर्वदा ईश्वरं सेवतां मोदतां च।

भृगुः: अस्तु श्रीमन्! तथैव आचरामि।

वरुणः: हे पुत्र! त्वं तपसा सूक्ष्मविज्ञानेन च अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, विज्ञानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ज्ञातवान्। एतैः पञ्चभिरेव अस्माकं पूर्णविकासो भवति, अतः एते ब्रह्मपदेन व्यवह्रियन्ते। ब्रह्मणः स्वरूपं तु ततोऽपि परे अस्ति। एतानि ब्रह्मज्ञानाय द्वाराणि सन्ति। यदि एतेषां क्रमशो विकासं करिष्यसि तर्हि ब्रह्मणः स्वरूपबोधो भविष्यति। उक्तञ्च—

आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।
स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः॥


भृगुः: अस्तु श्रीमन्! अनुगृहीतोऽस्मि।
हिंदी अर्थ: भृगु ने कहा— ठीक है श्रीमान्! (भृगु फिर बहुत समय तक तपस्या करते हैं। तपस्या करके प्रसन्न मुख के साथ पिता के निकट उपस्थित होते हैं) वरुण— हे वत्स! तपस्या से तुमने क्या जाना? भृगु— हे भगवन्! अत्यंत सूक्ष्म चिन्तन और तपस्या से मैंने ऐसा समझा कि **आनन्द ही ब्रह्म है**। वरुण— हे पुत्र! कैसे आनन्द ही ब्रह्म है? भृगु— हे पिताजी! हमारे सभी कर्म आनन्द के लिए होते हैं। हमारे कर्मों का लक्ष्य आनन्द की प्राप्ति ही है। आनन्द से ही प्राणी जीवित रहते हैं। आनन्द से रहित जीवन मृत्यु के रूप में है। इसलिए आनन्द ही ब्रह्म है। वरुण— हे वत्स! तुमने सत्य प्रकट किया है। इसलिए आनन्द की प्राप्ति के लिए प्रतिदिन ध्यान और योगासन करना चाहिए। प्राणियों पर दया करनी चाहिए। परोपकार करना चाहिए। राग, द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ, मोह का त्याग करना चाहिए। सदा ईश्वर की सेवा करनी चाहिए और आनन्दित रहना चाहिए। भृगु— ठीक है श्रीमान्! मैं वैसा ही आचरण करूँगा। वरुण— हे पुत्र! तुमने तपस्या और सूक्ष्म विज्ञान से अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द का महत्व जान लिया। इन पाँचों से ही हमारा पूर्ण विकास होता है, इसलिए इन्हें ब्रह्म के नाम से पुकारा जाता है। ब्रह्म का स्वरूप तो उससे भी परे है। ये ब्रह्मज्ञान के द्वार हैं। यदि इनका क्रमशः विकास करोगे तो ब्रह्म के स्वरूप का बोध होगा। कहा भी है— आहार की शुद्धि में सत्त्व की शुद्धि होती है, सत्त्व की शुद्धि में ध्रुव स्मृति (स्थिर स्मृति) होती है, और स्मृति की प्राप्ति होने पर सभी ग्रंथियों (संदेहों) का अत्यन्त मोक्ष (नाश) हो जाता है। भृगु— ठीक है श्रीमन्! मैं कृतज्ञ हूँ।
शब्द (Word) हिन्दी अर्थ संस्कृत पर्याय English
स्मृतिलम्भेआत्मज्ञान की प्राप्ति होने परध्रुवस्मृतेः प्राप्तौObtaining self actualization
विप्रमोक्षःअत्यन्त मोक्षअत्यन्त मोक्षःFinal liberation
हातव्याःत्याग करना चाहिएत्यक्तव्याःShould be sacrificed
सर्वग्रन्थीनाम्सभी गाँठ (संदेहों के)सर्वेषां ग्रन्थीनाम्Of all the doubts

अभ्यास प्रश्न (उत्तर सहित)

१. एकेन पदेन रिक्तस्थानं पूरयत—

(क) अन्नेन शरीरं वर्धते।
(ख) प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्।
(ग) प्राणेन विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति।
(घ) प्राणाद् एव इमानि भूतानि जायन्ते।
(ङ) मनसा समस्तानि इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते।
(च) बुद्धितत्त्वं विना बोधशक्तेः तर्कशक्तेश्च विकासो न भवति।
(छ) मनः एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्।

२. अधोलिखितानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत—

(क) भृगोः जिज्ञासा कस्मिन् विषये आसीत्?
उत्तरम्: भृगोः जिज्ञासा ब्रह्मविषये आसीत्। सः ज्ञातुम् इच्छति स्म यत् किं तद् ब्रह्म येन सर्वं जगदिदं सञ्चात्यते।

(ख) भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय किम् आचरितम्?
उत्तरम्: भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय बहुवारं तपः आचरितम्, स्वयमेव अन्वेषणं कृतम्।

(ग) भृगुः प्रथमं तपसा ब्रह्मरूपेण किं ज्ञातवान्?
उत्तरम्: भृगुः प्रथमं तपसा 'अन्नं वै ब्रह्म' इति ज्ञातवान्।

(घ) मनसः के जायन्ते?
उत्तरम्: मनसः सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते।

(ङ) प्राणिनः कस्मात् जायन्ते?
उत्तरम्: प्राणिनः अन्नाद् जायन्ते, प्राणाद् वा जायन्ते।

(च) इन्द्रियाणि केन सञ्चाल्यन्ते?
उत्तरम्: इन्द्रियाणि मनसा सञ्चाल्यन्ते।

(छ) शरीरं कुत्र प्रतिष्ठितम् अस्ति?
उत्तरम्: शरीरं प्राणे प्रतिष्ठितम् अस्ति।

(ज) केन विना स्मृतिशक्तेर्विकासो न भवति?
उत्तरम्: बुद्धितत्त्वं (विज्ञानं) विना स्मृतिशक्तेर्विकासो न भवति।

(झ) भृगुः तपसा केषां महत्त्वं ज्ञातवान्?
उत्तरम्: भृगुः तपसा अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, विज्ञानस्य, आनन्दस्य च (पञ्चकोषाणां) महत्त्वं ज्ञातवान्।

३. 'किं सत्यं किम् असत्यम्' इति रिक्तस्थाने पूरयत—

(क) प्रस्तुते पाठे पितापुत्रयोः संवादः अस्ति — सत्यम्
(ख) अस्मिन् संवादे अन्नस्य महत्त्वं वर्णितम् — सत्यम्
(ग) प्राणिनः मनसः जायन्ते इति कथनम् अस्ति — असत्यम्
(घ) अन्नेन शरीरं वर्धते इति — सत्यम्
(ङ) मनः सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति — असत्यम्
(च) भृगुः वरुणस्य पुत्रोऽस्ति — सत्यम्
(छ) भृगुः तपसा मनो ब्रह्मरूपेण ज्ञातवान् — सत्यम्
(ज) विना योगे तृतीया विभक्तिर्भवति — असत्यम्

४. क्रियापदेन सह समुचितं पदं योजयत—

(क) प्राणिनः — ३. जायन्ते
(ख) शरीरम् — ४. वर्धते
(ग) तपः — १. क्रियताम्
(घ) पितरं — ५. ब्रूते
(ङ) यत्नः — २. कुरुताम्

५. अविशिष्ट-धातुरूपाणि पूरयत (वर्तते धातुः - लट् लकार)
पुरुष एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम्
प्रथम वर्तते वर्तेते वर्तन्ते
मध्यम वर्तसे वर्तेथे वर्तध्वे
उत्तम वर्ते वर्तावहे वर्तामहे
६. एतानि पदानि लट्-लकारस्य त्रिषु पुरुषेषु रूपाणि पठत लिखत च—

(छात्रों को यह स्वयं अभ्यास करना है, यहाँ एक उदाहरण दिया गया है)

लभते (लट् लकार):
प्रथमपुरुष: लभते, लभेते, लभन्ते
मध्यमपुरुष: लभसे, लभेथे, लभध्वे
उत्तमपुरुष: लभे, लभावहे, लभामहे

७. आत्मनेपदिधातूनां लोट्-लकारे त्रिषु पुरुषेषु अभ्यासं कुरुत लिखत च—

मुद्-धातुः (लोट्-लकारः)

पुरुष एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम्
प्रथम मोदताम् मोदेताम् मोदन्ताम्
मध्यम मोदस्व मोदेथाम् मोदध्वम्
उत्तम मोदै मोदावहै मोदामहै

वर्ध्-धातुः (लोट्-लकारः)

पुरुष एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम्
प्रथम वर्धताम् वर्धेताम् वर्धन्ताम्
मध्यम वर्धस्व वर्धेथाम् वर्धध्वम्
उत्तम वर्धै वर्धावहै वर्धामहै
८. कतृपदानुसारं लोट्-लकारेण क्रियापदं परिवर्तयत—

उदाहरणम् — सः अन्नं सदा ईश्वरबुद्ध्या सेवते। -> भवान् सदा अन्नम् ईश्वरबुद्ध्या सेवताम्।

(क) बालकः अन्नं निन्दां भवान् न कुरुताम्।
(ख) मम जीवने यशो वर्धत। तव जीवने यशो वर्धताम्।
(ग) अहं बौद्धिकविकासाय सदा योगासनं करवे। त्वं बौद्धिकविकासाय सदा योगासनं कुरु।
(घ) रमेशः सर्वदा सत्यं भाषते। दिनेशः सर्वदा सत्यं भाषताम्।
(ङ) छात्रः लक्ष्यसिद्धये कष्टं सहते। अहं लक्ष्यसिद्धये कष्टं सहै।
(च) साधवः सर्वदा रमन्ते। भवन्तः सर्वदा रमन्ताम्।
(छ) भवान् योगेन आरोग्यं लभते। अहं योगेन आरोग्यं लभै।
(ज) रमा सदा सत्कर्मणि यतते। लता सदा सत्कर्मणि यतताम्।
(झ) भक्तः ईश्वरं वन्दते। त्वं ईश्वरं वन्दस्व।

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