द्वितीयः पाठः : सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः
कक्षा 9 - संस्कृत (शारदा) | सम्पूर्ण-गद्यांशार्थः, श्लोकार्थाः, शब्दार्थाः एवं अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
"सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः।"
अस्य आशयः अस्ति यत् वास्तविकसुखस्य आधारः धर्मः, धर्मपालनस्य च आधारः अर्थः। अर्थः इत्युक्ते धनं, यत् सर्वविधस्य आजीविकाव्यवहारस्य प्रमुखं साधनम्। जीवने धर्मः, अर्थः, सुखम् इत्येतेषां त्रयाणां परस्परसम्बन्धः अविच्छिन्नः अस्ति। यः जनः न्यायपूर्वकम् अर्थोपार्जनं करोति, सः धर्मपालनं कर्तुं समर्थः भवति, धर्मपालनेन च दीर्घकालिकं सुखं लभते।
इसका आशय यह है कि सच्चे सुख का आधार 'धर्म' (कर्तव्य एवं सदाचार) है और धर्म का पालन करने का आधार 'अर्थ' (धन) है। 'अर्थ' का अर्थ है धन, जो सभी प्रकार के जीवन-यापन एवं व्यवहार का मुख्य साधन है। जीवन में धर्म, अर्थ और सुख—इन तीनों का आपस में गहरा एवं अटूट सम्बन्ध है। जो मनुष्य न्यायसंगत (सदाचार के) मार्ग से धन कमाता है, वही धर्म का पालन करने में समर्थ होता है और धर्मपूर्वक जीने से ही मनुष्य को दीर्घकालिक (स्थायी) सुख प्राप्त होता है।
| कठिन-शब्दः | संस्कृत-पर्यायः / व्युत्पत्तिः | हिन्दी-अर्थः |
|---|---|---|
| यथार्थतत्त्वम् | वास्तविकं तत्त्वम् | वास्तविक सत्य / तत्त्व |
| अर्थः | धनम् / वित्तम् | धन / पैसा |
| अविच्छिन्नः | न विच्छिन्नः (अटूटः) | अटूट / गहरा सम्बन्ध |
| अर्थोपार्जनम् | अर्थस्य उपार्जनम् | धन कमाना |
| आजीविका | वृत्तिः | व्यवसाय / रोज़ी-रोटी |
| कठिन-शब्दः | संस्कृत-पर्यायः / व्युत्पत्तिः | हिन्दी-अर्थः |
|---|---|---|
| मूलभूतानाम् | प्रमुखाणाम् | प्राथमिक / मौलिक आवश्यकताओं का |
| पूर्तये | सम्पूर्तिनिमित्तम् | पूरा करने के लिए |
| बाधितानि | अवरोधितानि | रुक जाने वाले / बाधित |
| चतुर्वर्गेषु | धर्मार्थकाममोक्षेषु | चारों पुरुषार्थों में |
| ब्राह्मे मुहूर्ते | सूर्योदयात् पूर्वम् | ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पहले) में |
1. न्यायपूर्णम् अर्थोपार्जनम् - सन्मार्गेण एव धनार्जनं करणीयम् इति। उक्तं भगवता मनुना -
योऽर्थे शुचिर्हि सः शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः॥
2. औचित्यपूर्णः व्ययः - आवश्यकतानुसारं व्ययः करणीयः। येन व्ययेन स्वास्थ्यलाभः, विद्यार्जनम्, आत्मसुरक्षा वा भवेत्, सः व्ययः अवश्यं करणीयः। आडम्बरपूर्णः प्रदर्शनकारी व्ययः अथवा विलासव्यसनाय व्ययः अपव्ययः भवति। अपव्ययः वर्जनीयः, अतः प्रत्येकं व्ययस्य लेखः स्थापनीयः। अन्ते च तेषां परिशीलनं करणीयम्।
3. भविष्यदृष्ट्या सञ्चयः - उपार्जितधनस्य कश्चन भागः भविष्यसुरक्षायै सञ्चयनीयः। सञ्चयस्य अभ्यासेन जनः स्वावलम्बी भवति। स्वावलम्बनं स्वाभिमानस्य मूलं वर्तते। संकटकालेऽपि स्वाभिमानिजनः अन्यजनस्य आर्थिकसहायतां नापेक्षते।
1. न्यायपूर्ण धनार्जन: हमेशा सच्चाई एवं न्याय के मार्ग से ही धन कमाना चाहिए। महर्षि मनु ने कहा है— "सभी प्रकार की पवित्रताओं में धन की पवित्रता (ईमानदारी) ही सबसे श्रेष्ठ मानी गई है। जो धन के लेन-देन में पवित्र (ईमानदार) है, वही वास्तव में पवित्र है; केवल मिट्टी और जल से हाथ-पैर धोकर पवित्र होने वाला सच्चा पवित्र नहीं होता।" इसका आशय है कि अनैतिक कार्य से धन कभी नहीं कमाना चाहिए। "किसी के धन का लालच मत करो" (ईशावास्योपनिषद्) इस उपदेश को मन में रखकर अपनी विद्या और योग्यता से धन कमाना चाहिए।
2. उचित खर्च (औचित्यपूर्ण व्यय): अपनी आवश्यकता के अनुसार ही खर्च करना चाहिए। जिस खर्च से स्वास्थ्य-लाभ, विद्या-प्राप्ति अथवा आत्म-सुरक्षा हो, वह खर्च अवश्य करना चाहिए। दिखावे के लिए या बुरी आदतों (व्यसनों) पर किया गया खर्च 'अपव्यय' (व्यर्थ का खर्च) कहलाता है। अपव्यय से बचना चाहिए और प्रतिदिन के खर्चों का हिसाब (डायरी) रखना चाहिए।
3. भविष्य के लिए बचत (सञ्चय): कमाए हुए धन का कुछ हिस्सा भविष्य की सुरक्षा के लिए बचाकर रखना चाहिए। बचत करने की आदत से मनुष्य आत्मनिर्भर (स्वावलम्बी) बनता है। स्वावलम्बन ही स्वाभिमान का आधार है। संकट के समय भी स्वाभिमानी व्यक्ति को दूसरों के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता।
| कठिन-शब्दः | संस्कृत-पर्यायः / व्युत्पत्तिः | हिन्दी-अर्थः |
|---|---|---|
| अर्थशौचम् | धनस्य पवित्रता | धन के लेन-देन में ईमानदारी |
| शुचिः | पवित्रः / शुद्धः | पवित्र / ईमानदार |
| मा गृधः | लोभं न कुरु | लालच मत करो |
| अपव्ययः | व्यर्थव्ययः | व्यर्थ का खर्च / फ़िज़ूलख़र्ची |
| स्वावलम्बी | आत्मनिर्भरः | स्वावलंबी / आत्मनिर्भर |
अर्जितस्य सञ्चयः सञ्चितस्य च निवेशः - चाणक्यनीतौ उक्तम् -
स क्रमः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥
बचत और सही जगह निवेश: चाणक्यनीति में कहा गया है— "जिस प्रकार पानी की एक-एक बूँद लगातार गिरने से घड़ा भर जाता है; ठीक वही नियम सभी विद्याओं, धर्म और धन के संचय पर भी लागू होता है।" छोटी-छोटी बचत भी समय बीतने पर विशाल संपत्ति का रूप ले लेती है। यदि छात्र रोज़ छोटी बचत करके उसे बैंकों या सरकारी बचत योजनाओं में निवेश करें, तो उनका भविष्य सुरक्षित हो जाएगा।
| कठिन-शब्दः | संस्कृत-पर्यायः / व्युत्पत्तिः | हिन्दी-अर्थः |
|---|---|---|
| त्वरिताहारः | त्वरितः आहारः | फ़ास्ट फ़ूड (शीघ्र भोजन) |
| पुटीकृतभोजनम् | पुटीकृतं भोजनम् | डिब्बाबंद खाना |
| कष्टार्जितधनस्य | कष्टेन अर्जितम् | कठिनाई से कमाए धन का |
| नियतनिक्षेपः | नियतकालिकः निक्षेपः | फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) |
| आवृत्तिनिक्षेपः | आवृत्तिनिक्षेपः | रिकरिंग डिपॉजिट (RD) |
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥
जो विद्यार्थी आज धन के विषय में जागरूक है, वही कल देश का जिम्मेदार नागरिक बनता है। धर्म, अर्थ और सुख का संतुलन ही वास्तविक सफल जीवन का लक्षण है। इसीलिए कहा गया है— "एक-एक क्षण (समय) का उपयोग करके विद्या प्राप्त करनी चाहिए और एक-एक कण (पैसे) को बचाकर धन का संचय करना चाहिए। समय नष्ट हो जाने पर विद्या कहाँ से मिलेगी और पैसों का कण-कण नष्ट कर देने पर धन कहाँ से बचेगा?"
| कठिन-शब्दः | संस्कृत-पर्यायः / व्युत्पत्तिः | हिन्दी-अर्थः |
|---|---|---|
| विपन्ना | संकटग्रस्ता / निर्धना | कष्टयुक्त / बदहाल |
| उद्धृत्य | उद्धारं कृत्वा | ऊपर उठाकर / उबारकर |
| सन्तोलनम् | समन्वयः / सामंजस्यम् | संतुलन बनाना |
| क्षणशः | प्रति-क्षणम् | एक-एक क्षण करके |
| कणशः | प्रति-कणम् | एक-एक कण/पैसा करके |
| कठिन-शब्दः | संस्कृत-अर्थः | हिन्दी-अर्थः | English Meaning |
|---|---|---|---|
| अर्थः | धनम् / वित्तम् | धन / पैसा | Wealth / Money |
| अविच्छिन्नः | न विच्छिन्नः (अटूटः) | अटूट / गहरा सम्बन्ध | Inseparable |
| अर्थोपार्जनम् | अर्थस्य उपार्जनम् | धन कमाना | Earning Wealth |
| आजीविका | वृत्तिः | व्यवसाय / रोज़ी-रोटी | Livelihood |
| अर्थशौचम् | धनस्य पवित्रता | धन के लेन-देन में ईमानदारी | Financial Purity |
| मा गृधः | लोभं न कुरु | लालच मत करो | Don't Covet |
| अपव्ययः | व्यर्थव्ययः | व्यर्थ का खर्च / फ़िज़ूलख़र्ची | Unnecessary Expense |
| स्वावलम्बी | आत्मनिर्भरः | स्वावलंबी / आत्मनिर्भर | Self-reliant |
| त्वरिताहारः | त्वरितः आहारः | फ़ास्ट फ़ूड (शीघ्र भोजन) | Fast Food |
| पुटीकृतभोजनम् | पुटीकृतं भोजनम् | डिब्बाबंद खाना | Packaged Food |
| नियतनिक्षेपः | नियतकालिकः निक्षेपः | फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) | Fixed Deposit |
| आवृत्तिनिक्षेपः | आवृत्तिनिक्षेपः | रिकरिंग डिपॉजिट (RD) | Recurring Deposit |
| विपन्ना | संकटग्रस्ता / निर्धना | कष्टयुक्त / बदहाल | Destitute / Poor |
| सन्तोलनम् | समन्वयः / सामंजस्यम् | संतुलन बनाना | Balance |
(क) वास्तविकसुखस्य आधारः कः ?
(ख) कस्य अभावात् स्वकर्तव्यपालनं कठिनं भवति ?
(ग) स्वस्थः आर्थिकव्यवहारः कतिविधः भवति ?
(घ) कीदृशः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः ?
(ङ) स्वावलम्बनं कस्य मूलं वर्तते ?
(च) जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः किं पूर्यते ?
(क) "सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः" इतीदं प्रसिद्धं वाक्यं कस्मिन् ग्रन्थे प्राप्यते ?
(ख) सामान्यजीवने कासाम् आवश्यकतानां पूर्त्यर्थं धनम् आवश्यकम् ?
(ग) ब्राह्मे मुहूर्ते कयोः चिन्तनम् आवश्यकम् ?
(घ) जनः केन स्वावलम्बी भवति ?
(ङ) लघुलघुसञ्चयः अपि कालान्तरे केन रूपेण वर्धते ?
- (क) जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। ➔ चाणक्यनीतिः
- (ख) ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्। ➔ गरुडपुराणम्
- (ग) सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्। ➔ मनुस्मृतिः
- (घ) सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः। ➔ कौटिल्यस्य अर्थशास्त्रम्
(क) सुखस्य मूलं धर्मः।
(ख) दिनस्य आरम्भे धर्मार्थयोः चिन्तनम् आवश्यकम्।
(ग) सन्मार्गेण एव धनार्जनं करणीयम्।
(घ) अनैतिकः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः।
(ङ) संकटकाले स्वाभिमानिजनः अन्यजनस्य आर्थिकसहायतां नापेक्षते।
• विद्: विद्यते | विद्येते | विद्यन्ते
• लभ्: लभते | लभेते | लभन्ते
• अपेक्स: अपेक्षते | अपेक्षेते | अपेक्षन्ते
• वर्ध: वर्धते | वर्धेते | वर्धन्ते
• सेव्: सेवते | सेवेते | सेवन्ते
• मोद्: मोदते | मोदेते | मोदन्ते
(क) "सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः" इत्यस्य मुख्य आशयः कः अस्ति ?
(ख) गरुडपुराणे किम् उपदिष्टम् अस्ति ?
(ग) "सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्" इत्यस्य तात्पर्यं किम् ?
(घ) छात्रैः क्रियमाणः अपव्ययः कः ?
(ङ) "जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः" इति वाक्यं कः अवदत् ?
