सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः (Class 9 Sanskrit Sharda Ch 2) | सरलार्थः, शब्दार्थाः एवं अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि

द्वितीयः पाठः : सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः

कक्षा 9 - संस्कृत (शारदा) | सम्पूर्ण-गद्यांशार्थः, श्लोकार्थाः, शब्दार्थाः एवं अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि

📌 पाठ-परिचयः: भारतीय धर्मशास्त्रों एवं कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मानव जीवन के यथार्थ को प्रकट करने वाली अनेक सूक्तियाँ हैं। प्रस्तुत पाठ में धर्म, अर्थ और सुख के अनन्य सम्बन्ध, न्यायपूर्ण धनार्जन, अपव्यय-निषेध, बचत (सञ्चय) और छात्र जीवन में 'आर्थिक साक्षरता' (Financial Literacy) के महत्त्व को अत्यंत सरल एवं व्यावहारिक रूप से समझाया गया है।
📌 गद्यांशः - 1 (धर्मार्थयोः सम्बन्धः)
भारतीयधर्मशास्त्रेषु अनेकाः सूक्तयः विद्यन्ते, याः मानवजीवनस्य यथार्थतत्त्वं प्रतिपादयन्ति। तेष्वेकं प्रसिद्धं सूत्ररूपं वाक्यं कौटिल्यस्य अर्थशास्त्रे अस्ति -
"सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः।"
अस्य आशयः अस्ति यत् वास्तविकसुखस्य आधारः धर्मः, धर्मपालनस्य च आधारः अर्थः। अर्थः इत्युक्ते धनं, यत् सर्वविधस्य आजीविकाव्यवहारस्य प्रमुखं साधनम्। जीवने धर्मः, अर्थः, सुखम् इत्येतेषां त्रयाणां परस्परसम्बन्धः अविच्छिन्नः अस्ति। यः जनः न्यायपूर्वकम् अर्थोपार्जनं करोति, सः धर्मपालनं कर्तुं समर्थः भवति, धर्मपालनेन च दीर्घकालिकं सुखं लभते।
सरलार्थः: भारतीय धर्मशास्त्रों में अनेक सूक्तियाँ विद्यमान हैं, जो मनुष्य के जीवन के वास्तविक तत्त्व का प्रतिपादन करती हैं। उनमें से एक प्रसिद्ध सूत्र-वाक्य आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) के 'अर्थशास्त्र' में मिलता है— "सुख का मूल धर्म है और धर्म का मूल अर्थ (धन) है।"
इसका आशय यह है कि सच्चे सुख का आधार 'धर्म' (कर्तव्य एवं सदाचार) है और धर्म का पालन करने का आधार 'अर्थ' (धन) है। 'अर्थ' का अर्थ है धन, जो सभी प्रकार के जीवन-यापन एवं व्यवहार का मुख्य साधन है। जीवन में धर्म, अर्थ और सुख—इन तीनों का आपस में गहरा एवं अटूट सम्बन्ध है। जो मनुष्य न्यायसंगत (सदाचार के) मार्ग से धन कमाता है, वही धर्म का पालन करने में समर्थ होता है और धर्मपूर्वक जीने से ही मनुष्य को दीर्घकालिक (स्थायी) सुख प्राप्त होता है।
कठिन-शब्दःसंस्कृत-पर्यायः / व्युत्पत्तिःहिन्दी-अर्थः
यथार्थतत्त्वम्वास्तविकं तत्त्वम्वास्तविक सत्य / तत्त्व
अर्थःधनम् / वित्तम्धन / पैसा
अविच्छिन्नःन विच्छिन्नः (अटूटः)अटूट / गहरा सम्बन्ध
अर्थोपार्जनम्अर्थस्य उपार्जनम्धन कमाना
आजीविकावृत्तिःव्यवसाय / रोज़ी-रोटी
📌 गद्यांशः - 2 (अर्थस्य आवश्यकता एवं गरुडपुराण-वचनम्)
सामान्यजीवने अन्नं, वस्त्रम्, आवासः, शिक्षा, स्वास्थ्यसेवा चेत्यादीनां मूलभूतानाम् आवश्यकतानां पूर्तये धनम् आवश्यकम्। पर्याप्तधनस्य अभावात् स्वकर्तव्यपालनं कठिनं भवति। स्वास्थ्यं, शिक्षा, सेवा, दानम् चेत्यादीनि कार्याणि बाधितानि भवन्ति। दैनन्दिनजीवनं च असन्तुलितं भवति। अतः धर्मशास्त्रे चतुर्वर्गेषु धर्मार्थकाममोक्षेषु अर्थः अन्यतमः स्तम्भः इति गण्यते। उक्तं गरुडपुराणे -
"ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्।"
अर्थात् दिनस्य आरम्भे धर्मार्थयोः चिन्तनम् आवश्यकम्।
(नरः) ब्राह्मे मुहूर्ते उत्थाय च धर्मम् अर्थम् च चिन्तयेत्।
सरलार्थः: सामान्य जीवन में भोजन, वस्त्र, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए धन अनिवार्य है। पर्याप्त धन के बिना अपने कर्तव्यों का पालन करना कठिन हो जाता है। स्वास्थ्य, पढ़ाई, समाज-सेवा और दान जैसे परोपकारी कार्य रुक जाते हैं और दैनिक जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। इसीलिए धर्मशास्त्रों में जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में 'अर्थ' को मुख्य आधार-स्तम्भ माना गया है। गरुड़पुराण में कहा भी गया है— "मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) में उठकर धर्म और अर्थ (सत्कर्म और धनार्जन के उपायों) का चिंतन करना चाहिए।" अर्थात् दिन की शुरुआत में धर्म और अर्थ का सकारात्मक चिंतन आवश्यक है।
कठिन-शब्दःसंस्कृत-पर्यायः / व्युत्पत्तिःहिन्दी-अर्थः
मूलभूतानाम्प्रमुखाणाम्प्राथमिक / मौलिक आवश्यकताओं का
पूर्तयेसम्पूर्तिनिमित्तम्पूरा करने के लिए
बाधितानिअवरोधितानिरुक जाने वाले / बाधित
चतुर्वर्गेषुधर्मार्थकाममोक्षेषुचारों पुरुषार्थों में
ब्राह्मे मुहूर्तेसूर्योदयात् पूर्वम्ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पहले) में
📌 गद्यांशः - 3 (स्वस्थः आर्थिकव्यवहारः)
स्वस्थः आर्थिकव्यवहारः त्रिविधः भवति –
1. न्यायपूर्णम् अर्थोपार्जनम् - सन्मार्गेण एव धनार्जनं करणीयम् इति। उक्तं भगवता मनुना -
सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्।
योऽर्थे शुचिर्हि सः शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः॥
अस्य आशयः यत् अनैतिकः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः। "मा गृधः कस्यस्विद्धनम्" इति उपनिषदः वाक्यं सततं मनसि निधाय स्वकौशलेन विद्यया च धनम् उपार्जनीयम्।

2. औचित्यपूर्णः व्ययः - आवश्यकतानुसारं व्ययः करणीयः। येन व्ययेन स्वास्थ्यलाभः, विद्यार्जनम्, आत्मसुरक्षा वा भवेत्, सः व्ययः अवश्यं करणीयः। आडम्बरपूर्णः प्रदर्शनकारी व्ययः अथवा विलासव्यसनाय व्ययः अपव्ययः भवति। अपव्ययः वर्जनीयः, अतः प्रत्येकं व्ययस्य लेखः स्थापनीयः। अन्ते च तेषां परिशीलनं करणीयम्।

3. भविष्यदृष्ट्या सञ्चयः - उपार्जितधनस्य कश्चन भागः भविष्यसुरक्षायै सञ्चयनीयः। सञ्चयस्य अभ्यासेन जनः स्वावलम्बी भवति। स्वावलम्बनं स्वाभिमानस्य मूलं वर्तते। संकटकालेऽपि स्वाभिमानिजनः अन्यजनस्य आर्थिकसहायतां नापेक्षते।
सर्वेषाम् एव शौचानाम् अर्थशौचम् परम् स्मृतम्। यः हि अर्थे शुचिः (अस्ति), सः (एव वास्तवतः) शुचिः, मृद्-वारि-शुचिः (केवलम्) शुचिः न (भवति)।
उत्तम आर्थिक व्यवहार तीन प्रकार का होता है:
1. न्यायपूर्ण धनार्जन: हमेशा सच्चाई एवं न्याय के मार्ग से ही धन कमाना चाहिए। महर्षि मनु ने कहा है— "सभी प्रकार की पवित्रताओं में धन की पवित्रता (ईमानदारी) ही सबसे श्रेष्ठ मानी गई है। जो धन के लेन-देन में पवित्र (ईमानदार) है, वही वास्तव में पवित्र है; केवल मिट्टी और जल से हाथ-पैर धोकर पवित्र होने वाला सच्चा पवित्र नहीं होता।" इसका आशय है कि अनैतिक कार्य से धन कभी नहीं कमाना चाहिए। "किसी के धन का लालच मत करो" (ईशावास्योपनिषद्) इस उपदेश को मन में रखकर अपनी विद्या और योग्यता से धन कमाना चाहिए।

2. उचित खर्च (औचित्यपूर्ण व्यय): अपनी आवश्यकता के अनुसार ही खर्च करना चाहिए। जिस खर्च से स्वास्थ्य-लाभ, विद्या-प्राप्ति अथवा आत्म-सुरक्षा हो, वह खर्च अवश्य करना चाहिए। दिखावे के लिए या बुरी आदतों (व्यसनों) पर किया गया खर्च 'अपव्यय' (व्यर्थ का खर्च) कहलाता है। अपव्यय से बचना चाहिए और प्रतिदिन के खर्चों का हिसाब (डायरी) रखना चाहिए।

3. भविष्य के लिए बचत (सञ्चय): कमाए हुए धन का कुछ हिस्सा भविष्य की सुरक्षा के लिए बचाकर रखना चाहिए। बचत करने की आदत से मनुष्य आत्मनिर्भर (स्वावलम्बी) बनता है। स्वावलम्बन ही स्वाभिमान का आधार है। संकट के समय भी स्वाभिमानी व्यक्ति को दूसरों के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता।
कठिन-शब्दःसंस्कृत-पर्यायः / व्युत्पत्तिःहिन्दी-अर्थः
अर्थशौचम्धनस्य पवित्रताधन के लेन-देन में ईमानदारी
शुचिःपवित्रः / शुद्धःपवित्र / ईमानदार
मा गृधःलोभं न कुरुलालच मत करो
अपव्ययःव्यर्थव्ययःव्यर्थ का खर्च / फ़िज़ूलख़र्ची
स्वावलम्बीआत्मनिर्भरःस्वावलंबी / आत्मनिर्भर
📌 गद्यांशः - 4 (छात्रजीवने आर्थिकसाक्षरता एवं निवेशः)
छात्रजीवने आर्थिकसाक्षरता: अनेकदा छात्राः मातापितृभ्यां कष्टार्जितधनस्य तुच्छकारणैः अपव्ययं कुर्वन्ति। जिह्वालालसापूर्त्यर्थं त्वरिताहारः (Fast food), शीतपेयं, पुटीकृतभोजनं, तथैव व्यसनपदार्थानां सेवनं, प्रदर्शनकारिपरिधानं विलासितापूर्णम् आचरणं चेत्यादि यत्र प्रभूतः अपव्ययः भवति। एतैः न केवलं धनहानिः, स्वास्थ्यहानिरपि जायते। स्वास्थ्यहानिकारणात् पुनः धनव्ययो वर्धते।

अर्जितस्य सञ्चयः सञ्चितस्य च निवेशः - चाणक्यनीतौ उक्तम् -
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।
स क्रमः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥
लघु-लघुः सञ्चयोऽपि कालान्तरे महत्सम्पत्तिरूपेण वर्धते। यदि छात्राः प्रतिदिनम् अल्पधनस्यापि सञ्चयं कुर्वन्ति, तस्य उचितनिवेशं च कुर्वन्ति तर्हि तेषां भविष्यं सुरक्षितं भवेत्। भारतदेशे धनसञ्चयस्य सुरक्षितनिवेशस्य च कृते बहुविधाः मार्गाः सन्ति (यथा- प्रधानमन्त्री-जनधनयोजना, सुकन्या-समृद्धि-योजना, सार्वजनिक-भविष्य-निधिः PPF, नियतनिक्षेपः FD, आवृत्तिनिक्षेपः RD इत्यादयः)।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः घटः पूर्यते। सर्वविद्यानाम् धर्मस्य च धनस्य च सः (एव) क्रमः (भवति)।
विद्यार्थियों के लिए आर्थिक साक्षरता: अनेक बार छात्र माता-पिता द्वारा कठिन परिश्रम से कमाए गए धन को छोटी-छोटी व्यर्थ बातों में उड़ा देते हैं। जीभ के स्वाद के लिए फ़ास्ट फ़ूड, शीतल पेय, पैक्ड फ़ूड, दिखावटी कपड़े और फ़िज़ूलख़र्ची से बहुत धन नष्ट होता है। इससे केवल पैसों का नुकसान ही नहीं होता, बल्कि स्वास्थ्य भी बिगड़ता है और बीमार होने पर पुनः दवाइयों में धन खर्च होता है।

बचत और सही जगह निवेश: चाणक्यनीति में कहा गया है— "जिस प्रकार पानी की एक-एक बूँद लगातार गिरने से घड़ा भर जाता है; ठीक वही नियम सभी विद्याओं, धर्म और धन के संचय पर भी लागू होता है।" छोटी-छोटी बचत भी समय बीतने पर विशाल संपत्ति का रूप ले लेती है। यदि छात्र रोज़ छोटी बचत करके उसे बैंकों या सरकारी बचत योजनाओं में निवेश करें, तो उनका भविष्य सुरक्षित हो जाएगा।
कठिन-शब्दःसंस्कृत-पर्यायः / व्युत्पत्तिःहिन्दी-अर्थः
त्वरिताहारःत्वरितः आहारःफ़ास्ट फ़ूड (शीघ्र भोजन)
पुटीकृतभोजनम्पुटीकृतं भोजनम्डिब्बाबंद खाना
कष्टार्जितधनस्यकष्टेन अर्जितम्कठिनाई से कमाए धन का
नियतनिक्षेपःनियतकालिकः निक्षेपःफिक्स्ड डिपॉजिट (FD)
आवृत्तिनिक्षेपःआवृत्तिनिक्षेपःरिकरिंग डिपॉजिट (RD)
📌 गद्यांशः - 5 (निष्कर्षः एवं जीवन-सन्तुलनम्)
भौतिकतावादियुगस्य आकर्षणेन यूनामपव्ययः अधिको भवति येन कारणेन अस्माकम् आर्थिकस्थितिः विपन्ना भवति। किन्तु अर्थविषयकसचेतनता अस्मान् अभावात् उद्धृत्य आर्थिकसम्पन्नतां प्रति नयति। अतः बुद्धिमतां छात्राणां ध्येयं स्यात् - धनस्य उचितोपार्जनम्, व्ययस्य मर्यादा, आपत्कालीननिधिसञ्चयः, दीर्घकालीननिवेशश्च। यः एतेषाम् अनुशासनेन पालनं करोति, स एव यथार्थतः धनस्य धर्मस्य च सन्तोलनं स्थापयितुं शक्नोति। यः विद्यार्थी अद्य अर्थविषये जागरूकः अस्ति, सः भविष्ये उत्तरदायी नागरिकः भवति। धर्मः, अर्थः, सुखम् चेत्येतेषां सन्तोलनम् एव यथार्थजीवनस्य लक्षणम्। अत एवोक्तम् -
क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥
(जनः) क्षणशः एव विद्याम्, कणशः च अर्थम् साधयेत्। क्षणे नष्टे विद्या कुतः? कणे नष्टे धनम् कुतः?
सरलार्थः: आज के भौतिकतावादी युग में चकाचौंध के कारण युवाओं में फ़िजूलखर्ची बढ़ गई है, जिससे आर्थिक स्थिति खराब हो जाती है। परन्तु पैसों के प्रति जागरूकता हमें गरीबी से उबारकर आर्थिक संपन्नता की ओर ले जाती है। बुद्धिमान छात्रों का ध्येय होना चाहिए— सही तरीके से धन कमाना, खर्च पर संयम रखना, आपातकालीन स्थिति के लिए बचत करना और लंबे समय के लिए सही निवेश करना।

जो विद्यार्थी आज धन के विषय में जागरूक है, वही कल देश का जिम्मेदार नागरिक बनता है। धर्म, अर्थ और सुख का संतुलन ही वास्तविक सफल जीवन का लक्षण है। इसीलिए कहा गया है— "एक-एक क्षण (समय) का उपयोग करके विद्या प्राप्त करनी चाहिए और एक-एक कण (पैसे) को बचाकर धन का संचय करना चाहिए। समय नष्ट हो जाने पर विद्या कहाँ से मिलेगी और पैसों का कण-कण नष्ट कर देने पर धन कहाँ से बचेगा?"
कठिन-शब्दःसंस्कृत-पर्यायः / व्युत्पत्तिःहिन्दी-अर्थः
विपन्नासंकटग्रस्ता / निर्धनाकष्टयुक्त / बदहाल
उद्धृत्यउद्धारं कृत्वाऊपर उठाकर / उबारकर
सन्तोलनम्समन्वयः / सामंजस्यम्संतुलन बनाना
क्षणशःप्रति-क्षणम्एक-एक क्षण करके
कणशःप्रति-कणम्एक-एक कण/पैसा करके
📖 पाठस्य सम्पूर्ण कठिन-शब्दार्थाः (NCERT Vocabulary)
कठिन-शब्दःसंस्कृत-अर्थःहिन्दी-अर्थःEnglish Meaning
अर्थःधनम् / वित्तम्धन / पैसाWealth / Money
अविच्छिन्नःन विच्छिन्नः (अटूटः)अटूट / गहरा सम्बन्धInseparable
अर्थोपार्जनम्अर्थस्य उपार्जनम्धन कमानाEarning Wealth
आजीविकावृत्तिःव्यवसाय / रोज़ी-रोटीLivelihood
अर्थशौचम्धनस्य पवित्रताधन के लेन-देन में ईमानदारीFinancial Purity
मा गृधःलोभं न कुरुलालच मत करोDon't Covet
अपव्ययःव्यर्थव्ययःव्यर्थ का खर्च / फ़िज़ूलख़र्चीUnnecessary Expense
स्वावलम्बीआत्मनिर्भरःस्वावलंबी / आत्मनिर्भरSelf-reliant
त्वरिताहारःत्वरितः आहारःफ़ास्ट फ़ूड (शीघ्र भोजन)Fast Food
पुटीकृतभोजनम्पुटीकृतं भोजनम्डिब्बाबंद खानाPackaged Food
नियतनिक्षेपःनियतकालिकः निक्षेपःफिक्स्ड डिपॉजिट (FD)Fixed Deposit
आवृत्तिनिक्षेपःआवृत्तिनिक्षेपःरिकरिंग डिपॉजिट (RD)Recurring Deposit
विपन्नासंकटग्रस्ता / निर्धनाकष्टयुक्त / बदहालDestitute / Poor
सन्तोलनम्समन्वयः / सामंजस्यम्संतुलन बनानाBalance
📝 अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि (NCERT Solutions)
1. एकपदेन उत्तरं लिखत (एक पद में उत्तर लिखिए):

(क) वास्तविकसुखस्य आधारः कः ?

उत्तरम्: धर्मः

(ख) कस्य अभावात् स्वकर्तव्यपालनं कठिनं भवति ?

उत्तरम्: पर्याप्तधनस्य (अर्थस्य)

(ग) स्वस्थः आर्थिकव्यवहारः कतिविधः भवति ?

उत्तरम्: त्रिविधः

(घ) कीदृशः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः ?

उत्तरम्: अनैतिकः

(ङ) स्वावलम्बनं कस्य मूलं वर्तते ?

उत्तरम्: स्वाभिमानस्य

(च) जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः किं पूर्यते ?

उत्तरम्: घटः
2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत (पूर्ण वाक्य में उत्तर लिखिए):

(क) "सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः" इतीदं प्रसिद्धं वाक्यं कस्मिन् ग्रन्थे प्राप्यते ?

उत्तरम्: "सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः" इतीदं प्रसिद्धं वाक्यं कौटिल्यस्य अर्थशास्त्रे प्राप्यते।

(ख) सामान्यजीवने कासाम् आवश्यकतानां पूर्त्यर्थं धनम् आवश्यकम् ?

उत्तरम्: सामान्यजीवने अन्नं, वस्त्रम्, आवासः, शिक्षा, स्वास्थ्यसेवा चेत्यादीनां मूलभूतानाम् आवश्यकतानां पूर्त्यर्थं धनम् आवश्यकम्।

(ग) ब्राह्मे मुहूर्ते कयोः चिन्तनम् आवश्यकम् ?

उत्तरम्: ब्राह्मे मुहूर्ते धर्मार्थयोः (धर्मस्य अर्थस्य च) चिन्तनम् आवश्यकम्।

(घ) जनः केन स्वावलम्बी भवति ?

उत्तरम्: जनः धनस्य सञ्चयस्य अभ्यासेन स्वावलम्बी भवति।

(ङ) लघुलघुसञ्चयः अपि कालान्तरे केन रूपेण वर्धते ?

उत्तरम्: लघुलघुसञ्चयः अपि कालान्तरे महत्सम्पत्तिरूपेण वर्धते।
3. वाक्येन सह ग्रन्थस्य सम्मेलनं कुरुत (सही ग्रन्थ का मिलान कीजिए):
  • (क) जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। ➔ चाणक्यनीतिः
  • (ख) ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्। ➔ गरुडपुराणम्
  • (ग) सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्। ➔ मनुस्मृतिः
  • (घ) सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः। ➔ कौटिल्यस्य अर्थशास्त्रम्
4. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत (प्रश्न निर्माण कीजिए):

(क) सुखस्य मूलं धर्मः

प्रश्नः: सुखस्य मूलं कः ?

(ख) दिनस्य आरम्भे धर्मार्थयोः चिन्तनम् आवश्यकम्।

प्रश्नः: दिनस्य आरम्भे कयोः चिन्तनम् आवश्यकम् ?

(ग) सन्मार्गेण एव धनार्जनं करणीयम्।

प्रश्नः: केन एव धनार्जनं करणीयम् ?

(घ) अनैतिकः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः।

प्रश्नः: कीदृशः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः ?

(ङ) संकटकाले स्वाभिमानिजनः अन्यजनस्य आर्थिकसहायतां नापेक्षते।

प्रश्नः: संकटकाले कः अन्यजनस्य आर्थिकसहायतां नापेक्षते ?
5. उचितैः पदैः रूपधातु-सारणीं पूरयत (आत्मनेपद धातु-रूपाणि):

विद्: विद्यते | विद्येते | विद्यन्ते

लभ्: लभते | लभेते | लभन्ते

अपेक्स: अपेक्षते | अपेक्षेते | अपेक्षन्ते

वर्ध: वर्धते | वर्धेते | वर्धन्ते

सेव्: सेवते | सेवेते | सेवन्ते

मोद्: मोदते | मोदेते | मोदन्ते

6. अधोलिखितानां प्रश्नानां शुद्धं विकल्पं चिनुत (सही विकल्प चुनिए):

(क) "सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः" इत्यस्य मुख्य आशयः कः अस्ति ?

उत्तरम्: (३) धर्मस्य आधारः अर्थः, सुखस्य आधारः धर्मः।

(ख) गरुडपुराणे किम् उपदिष्टम् अस्ति ?

उत्तरम्: (२) प्रभाते धर्मार्थयोः चिन्तनं करणीयम्।

(ग) "सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्" इत्यस्य तात्पर्यं किम् ?

उत्तरम्: (३) अर्थशौचं सर्वोपरि, अन्यविधशौचेभ्यः श्रेयः।

(घ) छात्रैः क्रियमाणः अपव्ययः कः ?

उत्तरम्: (३) आडम्बरयुक्तः प्रदर्शनात्मकः व्ययः।

(ङ) "जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः" इति वाक्यं कः अवदत् ?

उत्तरम्: (२) चाणक्यः।

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