प्रथमः पाठः : सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्
कक्षा 9 - संस्कृत (शारदा) | सम्पूर्ण-गीतार्थः, अन्वयः, शब्दार्थाः एवं अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
📌 पाठ-परिचयः: संस्कृतं भारतदेशस्य सम्पदस्ति। अस्मिन् भारतीयानां ज्ञानवैभवं सञ्चितमस्ति। संस्कृताध्ययनेन मानवः सुसंस्कृतः भवति। भारतीयभाषाणां सुचारुरूपेण अध्ययनार्थं संस्कृतं नितराम् अपेक्षितम् अस्ति। संस्कृताध्ययनेन किं किं साधितं भवति इति विषयम् अधिकृत्य कविना एतत् सुन्दरं गीतं प्रस्तुतम्।
भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम्
भारतीयत्वसम्पादकं संस्कृतम्
ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकं संस्कृतम्
सर्वदानन्दसन्दोहदं संस्कृतम्॥1॥
🎯 अन्वयः:
संस्कृतम् भारतीय-एकतायाः साधकम्, (संस्कृतम्) भारतीयत्वस्य सम्पादकम्, (संस्कृतम्) ज्ञानपुञ्जस्य प्रभायाः दर्शकम्, (च संस्कृतम्) सर्वदा आनन्दस्य सन्दोहदम् (भवति)।
🇮🇳 विस्तृत-हिन्दी-अनुवादः एवं भावार्थः:
सरलार्थः: संस्कृत भाषा सम्पूर्ण भारतवर्ष को एकता के सूत्र में पिरोने (जोड़ने) वाली है। यह भारतवासियों के भीतर 'भारतीयता' के गौरवमयी भाव का संपादन और विकास करती है। यह महान ज्ञान-समूह के प्रकाश एवं दिव्य ज्योति का दर्शन कराती है तथा मनुष्य को सदैव असीम आनंद का समूह प्रदान करती है।
सर्वमस्तिष्कसंस्कारकं संस्कृतम्
सर्ववाणीपरिष्कारकं संस्कृतम्
सत्पथप्रेरणादायकं संस्कृतम्
सद्गुणग्रामसन्धायकं संस्कृतम्॥2॥
🎯 अन्वयः:
संस्कृतम् सर्व-मस्तिष्क-संस्कारकम्, (संस्कृतम्) सर्व-वाणी-परिष्कारकम्, (संस्कृतम्) सत्पथ-प्रेरणादायकम्, (च संस्कृतम्) सद्गुण-ग्राम-सन्धायकम् (अस्ति)।
🇮🇳 विस्तृत-हिन्दी-अनुवादः एवं भावार्थः:
सरलार्थः: संस्कृत भाषा सभी मनुष्यों के मस्तिष्क एवं विचारों को परिष्कृत करके सुसंस्कृत बनाती है। यह सभी प्राणियों की वाणी में मधुरता लाकर उसे शुद्ध एवं दोषरहित करती है। यह मानव को सदा सत्य एवं न्याय के मार्ग (सन्मार्ग) पर चलने की प्रेरणा देती है और मनुष्य के भीतर सभी श्रेष्ठ गुणों के समूह को विकसित एवं धारण करवाती है।
विश्वबंधुत्वविस्तारकं संस्कृतम्
सर्वभूतैकताकारकं संस्कृतम्
सर्वतः शान्तिसंस्थापकं संस्कृतम्
पञ्चशीलप्रतिष्ठापकं संस्कृतम्॥3॥
🎯 अन्वयः:
संस्कृतम् विश्वबन्धुत्वस्य विस्तारकम्, (संस्कृतम्) सर्वभूतानाम् एकताकारकम्, (संस्कृतम्) सर्वतः शान्तेः संस्थापकम्, (च संस्कृतम्) पञ्चशीलानाम् प्रतिष्ठापकम् (अस्ति)।
🇮🇳 विस्तृत-हिन्दी-अनुवादः एवं भावार्थः:
सरलार्थः: संस्कृत भाषा 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (सम्पूर्ण पृथ्वी ही परिवार है) के अनुसार विश्वबंधुत्व और भाईचारे की भावना का विस्तार करती है। यह संसार के सभी प्राणिमात्र में आत्मीयता एवं एकता का भाव जागृत करती है। यह सर्वत्र सुख और शांति की स्थापना करती है तथा महान नैतिक आदर्शों एवं 'पंचशील' (सदाचार के पाँच नियमों) की समाज में प्रतिष्ठा करती है।
त्यागसन्तोषसेवाव्रतं संस्कृतम्
विश्वकल्याणनिष्ठायुतं संस्कृतम्
ज्ञानविज्ञानसम्मेलनं संस्कृतम्
भुक्तिमुक्तिद्वयोद्वेलनं संस्कृतम्॥4॥
🎯 अन्वयः:
संस्कृतम् त्याग-सन्तोष-सेवा-व्रतम् (अस्ति), (संस्कृतम्) विश्वकल्याणस्य निष्ठा-युतम्, (संस्कृतम्) ज्ञान-विज्ञानयोः सम्मेलनम्, (च संस्कृतम्) भुक्ति-मुक्ति-द्वयोः उद्वेलनम् (अस्ति)।
🇮🇳 विस्तृत-हिन्दी-अनुवादः एवं भावार्थः:
सरलार्थः: संस्कृत भाषा त्याग, संतोष और निःस्वार्थ सेवा के जीवन-व्रत को धारण कराने वाली है। यह सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की भावना और निष्ठा से ओत-प्रोत है। इसमें आध्यात्मिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन दोनों का अद्भुत संगम (सम्मेलन) विद्यमान है। यह मनुष्य को सांसारिक सुख-भोग (भुक्ति) देने के साथ-साथ परम मोक्ष (मुक्ति) का मार्ग भी प्रशस्त करती है।
धर्मकामार्थमोक्षप्रदं संस्कृतम्
ऐहिकामुष्मिकोत्कर्षदं संस्कृतम्
कर्मदं ज्ञानदं भक्तिदं संस्कृतम्
सत्यनिष्ठं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्॥5॥
🎯 अन्वयः:
संस्कृतम् धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-प्रदम्, (संस्कृतम्) ऐहिक-आमुष्मिक-उत्कर्षदम्, (संस्कृतम्) कर्मदम् ज्ञानदम् भक्तिदम्, (च संस्कृतम्) सत्यनिष्ठम् शिवम् सुन्दरम् (अस्ति)।
🇮🇳 विस्तृत-हिन्दी-अनुवादः एवं भावार्थः:
सरलार्थः: संस्कृत भाषा जीवन के चारों पुरुषार्थों— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाली है। यह मनुष्य को इस भौतिक लोक (ऐहिक) में सफलता देने के साथ-साथ परलोक (आमुष्मिक) में भी उन्नति प्रदान करती है। यह श्रेष्ठ कर्म, निष्काम ज्ञान और प्रभु-भक्ति प्रदान करने वाली है; अतः संस्कृत भाषा सत्यनिष्ठा से परिपूर्ण, अत्यंत कल्याणकारी (शिव) और परम सुंदर है।
शब्दलालित्यलीलावनं संस्कृतम्
चारुमाधुर्यधारागृहं संस्कृतम्
विश्वचेतश्चमत्कारकं संस्कृतम्
पूर्वजानां यशः स्मारकं संस्कृतम्॥6॥
🎯 अन्वयः:
संस्कृतम् शब्द-लालित्यस्य लीलावनम्, (संस्कृतम्) चारु-माधुर्य-धारागृहम्, (संस्कृतम्) विश्व-चेतः-चमत्कारकम्, (च संस्कृतम्) पूर्वजानाम् यशसः स्मारकम् (अस्ति)।
🇮🇳 विस्तृत-हिन्दी-अनुवादः एवं भावार्थः:
सरलार्थः: संस्कृत भाषा शब्दों के अलौकिक सौन्दर्य एवं लालित्य की क्रीड़ा-स्थली (उद्यान) के समान है। यह अति मनोहर मधुरता के अमृत-रस की धारा का शीतल गृह है। यह सम्पूर्ण विश्व के मन और बुद्धि को अपने विलक्षण सामर्थ्य से चमत्कृत एवं आनंदित करने वाली है और हमारे महान पूर्वजों, ऋषियों एवं मनीषियों के अमूल्य यश व कीर्ति का स्मरण कराने वाली अमर वाणी है।
| कठिन-शब्दः | संस्कृत-अर्थः | हिन्दी-अर्थः | English Meaning |
| सन्दोहः | समूहः | समूह (राशि) | Group / Clump |
| पुञ्जः | राशिः | समूह / प्रकाश-पुंज | Clump / Beam |
| प्रभा | दीप्तिः | प्रकाश / चमक | Light / Radiance |
| परिष्कारकम् | संस्कारकम् / शुद्धिकारकम् | शुद्ध करने वाली | Refiner |
| सत्पथः | सन्मार्गः | सत्य का मार्ग | Noble Path |
| विस्तारकम् | विस्तारं करोति यत् | विस्तार करने वाली | Expander |
| उद्वेलनम् | उदयकृत् / उत्थानम् | उत्थान करने वाला | Awakener |
| ऐहिकम् | इह लोके भवम् | इस संसार का | Of this world |
| आमुष्मिकम् | परलोकस्य | परलोक का | Of the other world |
| उत्कर्षदम् | उत्कर्षं ददाति इति | उन्नति देने वाली | Bestower of excellence |
| कर्मदम् | कर्म ददाति इति | पुरुषार्थ/कर्म देने वाली | Bestower of action |
| भक्तिदम् | भक्तिं ददाति इति | भक्ति देने वाली | Bestower of Bhakti |
| लीलावनम् | लीलायाः वनम् | क्रीड़ा उद्यान | Garden for play |
| चारु | सुन्दरम् / मनोहरम् | सुंदर | Beautiful |
| माधुर्यधारा | माधुर्यस्य धारा | मधुर रस की धारा | Flow of Sweetness |
✍️ कवि-काव्य-परिचयः:
वाराणसी में स्थित सार्वभौम संस्कृत प्रचार कार्यालय के संस्थापक पंडित वासुदेव शास्त्री द्विवेदी महाभाग इस गीत के रचयिता हैं। उन्होंने सरल संस्कृत में अनेक ग्रंथों की रचना की और संस्कृत के प्रचारार्थ विपुल साहित्य प्रकाशित किया। 'परमार्थसुधा' नामक संस्कृत पत्रिका का संपादन भी उन्होंने किया। सुरभारतीसंदेशः, स्वर्गीयसंस्कृतकविसम्मेलनं, भोजराज्ये संस्कृतसाम्राज्यं, कौत्सस्य गुरुदक्षिणा आदि उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।
📝 अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि (NCERT Solutions)
2. एकपदेन उत्तरं लिखत (एक पद में उत्तर लिखिए):
(क) संस्कृतं कस्याः साधकम् ?
उत्तरम्: भारतीयैकतायाः
(ख) सर्वदा संस्कृतं कस्य सन्दोहदम् ?
उत्तरम्: आनन्दस्य
(ग) संस्कृतं कस्य प्रेरणादायकम् ?
उत्तरम्: सत्पथस्य
(घ) संस्कृतं कासां परिष्कारकम् ?
उत्तरम्: सर्वासां वाणीनाम् (सर्ववाण्याः)
(ङ) कस्य विस्तारकं संस्कृतम् ?
उत्तरम्: विश्वबन्धुत्वस्य
3. पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत (पूर्ण वाक्य में उत्तर लिखिए):
(क) सर्वतः कस्याः संस्थापकं संस्कृतम् ?
उत्तरम्: सर्वतः शान्तेः संस्थापकं संस्कृतम्।
(ख) कीदृशं व्रतं संस्कृतम् ?
उत्तरम्: त्यागसन्तोषसेवाव्रतं संस्कृतम्।
(ग) कयोः सम्मेलनं संस्कृतम् ?
उत्तरम्: ज्ञानविज्ञानयोः सम्मेलनं संस्कृतम्।
(घ) संस्कृतं कस्य चमत्कारकम् ?
उत्तरम्: संस्कृतं विश्वचेतसः चमत्कारकम्।
(ङ) केषां यशः स्मारकं संस्कृतम् ?
उत्तरम्: पूर्वजानां यशः स्मारकं संस्कृतम्।
4. रिक्तस्थानानि पूरयन्तु (रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए):
(क) भारतीयत्व- सम्पादकं संस्कृतम् ।
(ख) ज्ञानपुञ्जप्रभा- दर्शकं संस्कृतम् ।
(ग) सर्वमस्तिष्क- संस्कारकं संस्कृतम् ।
(घ) कर्मदं ज्ञानदं भक्तिदं संस्कृतम् ।
(ङ) सत्यनिष्ठं शिवं सुन्दरम् संस्कृतम् ।
(च) शब्दलालित्य लीलावनम् संस्कृतम् ।
5. मञ्जूषायाः पदानि उपयुज्य वाक्यरचनां कुरुत (वाक्य रचना कीजिए):
- (क) संस्कृतभाषा सर्ववाणीपरिष्कारिका भवति।
- (ख) एषा भाषा भारतीयैकतायाः साधिका अस्ति।
- (ग) संस्कृतं सर्वतः शान्तिं संस्थापयति।
- (घ) एतद् छात्रान् सत्पथे प्रेरयितुं शक्नोति।
- (ङ) संस्कृतं विश्वकल्याणाय सेवायाः त्यागस्य च सन्देशं ददाति।
- (च) संस्कृतं पूर्वजानां सुंदरं यशः स्मारयति।
6. अधोलिखितानां समस्तपदानां विग्रहं कुरुत (समास विग्रह कीजिए):
(क) ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकम् ➔ ज्ञानपुञ्जस्य प्रभायाः दर्शकम्
(ख) सर्ववाणीपरिष्कारकम् ➔ सर्वासां वाणीनाम् परिष्कारकम्
(ग) विश्वबंधुत्वविस्तारकम् ➔ विश्वबंधुत्वस्य विस्तारकम्
(घ) सर्वभूतैकताकारकम् ➔ सर्वेषां भूतानाम् एकतायाः कारकम्
(ङ) शान्तिसंस्थापकम् ➔ शान्तेः संस्थापकम्
(च) ज्ञानविज्ञानसम्मेलनम् ➔ ज्ञानस्य विज्ञानस्य च सम्मेलनम्
7. प्रदत्तमञ्जूषातः पर्यायपदानि चित्वा रिक्तस्थाने लिखत:
(क) विद्वांसः अनुपमाः भवन्ति ।
(ख) सूर्यस्य किरणः सर्वेषां प्राणिनां कृते हितकरः भवति ।
(ग) ईश्वरं स्मृत्वा उल्लासः उपजायते ।
(घ) विद्यायाः मानम् अजरं भवति ।
(ङ) प्रकृतेः शोभा तेजोराशयः विद्यते ।
(च) यत्र जगत् एकनीडं भवति ।
8. अधोलिखितानां समुचितं मेलनं कुरुत (सही मिलान कीजिए):
- (क) भारतीयैकतायाः ➔ साधकम्
- (ख) सत्पथे ➔ प्रेरणादायकम्
- (ग) त्यागसन्तोषसेवारूपम् ➔ व्रतम्
- (घ) ज्ञानपुञ्जप्रभायाः ➔ दर्शकम्
- (ङ) विश्वबन्धुत्वस्य ➔ विस्तारकम्