द्वितीयः पाठः : नास्ति त्यागसमं सुखम्
कक्षा 10 - संस्कृत (मणिका भाग-2) | सम्पूर्ण-गद्यांश-अनुवादः, शब्दार्थाः, श्लोकार्थाः एवं अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
अथ एकदा भगवान् बोधिसत्त्वः बहुजन्मार्जितपुण्यफलैः शिवीनां राजा अभवत्। स बाल्यात् एव वृद्धोपसेवी, विनयशीलः, शास्त्रपारङ्गतः च आसीत्। जनकल्याणकर्मसु रतः असौ पुत्रवत् प्रजाः पालयति स्म। कारुण्य-औदार्यादिसद्गुणोपेतः स नगरस्य समन्ततः धन-धान्यसमृद्धाः दानशालाः अकारयत्। तत्र अर्थिनां समूहः अन्न-पान-वसन-रजत-सुवर्णादिकानि अभीष्टानि वस्तूनि प्राप्य सन्तुष्टः अभवत्। राज्ञः दानशीलताम् आकर्ण्य देशान्तरेभ्योऽपि जनाः तं देशम् आयान्ति स्म।
🇮🇳 सम्पूर्ण-हिन्दी-अनुवादः:
इसके बाद एक बार भगवान् बोधिसत्त्व अनेक पूर्वजन्मों में अर्जित किए गए पुण्य के फलों से शिबि देश के राजा बने[cite: 2]। वे बचपन से ही वृद्धों की सेवा करने वाले, विनम्र स्वभाव वाले और शास्त्रों में पारंगत थे[cite: 2]। जनकल्याण के कार्यों में लगे हुए वे राजा पुत्र के समान प्रजा का पालन करते थे[cite: 2]। करुणा और उदारता आदि श्रेष्ठ गुणों से युक्त उन्होंने नगर के चारों ओर धन और अनाज से समृद्ध दानशालाएँ बनवाईं[cite: 2]। वहाँ याचकों (माँगने वालों) का समूह अन्न, जल, वस्त्र, चाँदी, सोना आदि मनचाही वस्तुएँ पाकर संतुष्ट होता था[cite: 2]। राजा की दानशीलता को सुनकर दूसरे देशों से भी लोग उस देश में आते थे[cite: 2]।
📖 कठिन-शब्दाः एवं शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| बोधिसत्त्वः | ज्ञानाय यः प्रयतते सः | ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील प्राणी[cite: 2] |
| वृद्धोपसेवी | वृद्ध + उपसेवी | बुजुर्गों की सेवा करने वाला[cite: 2] |
| शास्त्रपारङ्गतः | शास्त्रेषु पारङ्गतः | शास्त्रों में दक्ष/निपुण[cite: 2] |
| समन्ततः | परितः | चारों ओर[cite: 2] |
| अभीष्टानि | इच्छितानि | मनचाही / इच्छित[cite: 2] |
| आकर्ण्य | श्रुत्वा | सुनकर[cite: 2] |
अथ कदाचित् दानशालासु विचरन् स राजा बहुधनलाभेन सन्तुष्टानाम् अर्थिनां विरलसंख्यां विलोक्य अचिन्तयत् 'मम अर्थिनः तु धनलाभमात्रेण सन्तोषं भजन्ते। नूनं ते दानवीराः सौभाग्यशालिनः यान् याचकाः शरीरस्य अङ्गानि अपि याचन्ते।' एवं राज्ञः स्वेषु गात्रेष्वपि निरासक्तिं विज्ञाय सकलं ब्रह्माण्डं व्याकुलं सञ्जातम्।
🇮🇳 सम्पूर्ण-हिन्दी-अनुवादः:
इसके बाद कभी दानशालाओं में घूमते हुए उस राजा ने बहुत धन के लाभ से संतुष्ट हुए याचकों की कम संख्या को देखकर सोचा—"मेरे याचक तो केवल धन के लाभ मात्र से ही संतोष कर लेते हैं[cite: 2]। निश्चित रूप से वे दानवीर सौभाग्यशाली हैं, जिनसे याचक शरीर के अंगों की भी याचना करते हैं[cite: 2]।" इस प्रकार राजा की अपने शरीर के अंगों के प्रति भी वैराग्य (निरासक्ति) भावना को जानकर संपूर्ण ब्रह्मांड व्याकुल हो गया[cite: 2]।
📖 कठिन-शब्दाः एवं शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| विरलसंख्याम् | कम संख्याम् | कम संख्या को[cite: 2] |
| अर्थिनः | याचकाः | माँगने वाले / याचक[cite: 2] |
| गात्रेषु | अङ्गेषु | शरीर के अंगों में[cite: 2] |
| निरासक्तिम् | वैराग्यम् | अनासक्ति / वैराग्य[cite: 2] |
| ब्रह्माण्डम् | सम्पूर्णा सृष्टिः | समस्त सृष्टि[cite: 2] |
राज्ञि एवं विचारयति सति तस्य दानशीलतां परीक्षितुं देवाधिपतिः शक्रः नेत्रहीनयाचकस्य रूपं धारयित्वा तत्पुरतः अवदत्- हे राजन् ! भवतः दानवीरताम् आकर्ण्य आशान्वितः भवत्समीपम् आगतोऽस्मि। देव ! रवि-शशि-तारा-मण्डलभूषितं जगत् एतत् कथमिव पश्येयं चक्षुर्हीनः।
राजा उवाच - भगवन् ! भवन्मनोरथं पूरयित्वा आत्मानम् अनुगृहीतं कर्तुम् इच्छामि। आदिश्यतां किं करवाणि ? विप्रः अकथयत् - यदि भवान् प्रीतः, तदा त्वत्तः एकस्य चक्षुषः दानम् इच्छामि येन मम लोकयात्रा निर्बाधा भवेत्।
🇮🇳 सम्पूर्ण-हिन्दी-अनुवादः:
राजा के ऐसा विचार करने पर, उनकी दानशीलता की परीक्षा लेने के लिए देवों के राजा इंद्र (शक्र) ने एक नेत्रहीन याचक का रूप धारण करके उनके सामने कहा—"हे राजन्! आपकी दानवीरता के बारे में सुनकर आशा से युक्त होकर आपके पास आया हूँ[cite: 2]। हे देव! सूर्य, चंद्रमा और तारा-मंडल से सुशोभित इस संसार को मैं नेत्रहीन व्यक्ति भला कैसे देखूँ[cite: 2]?"
राजा ने कहा—"भगवन्! आपकी इच्छा पूरी करके मैं स्वयं को धन्य करना चाहता हूँ[cite: 2]। आज्ञा दीजिए, मैं क्या करूँ[cite: 2]?" ब्राह्मण (याचक रूपी इंद्र) ने कहा—"यदि आप प्रसन्न हैं, तो आपसे एक आँख का दान चाहता हूँ, जिससे मेरी जीवन-यात्रा बिना किसी बाधा के चल सके[cite: 2]।"
📖 कठिन-शब्दाः एवं शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| शक्रः | इन्द्रः | देवराज इंद्र[cite: 2] |
| आशान्वितः | आशया अन्वितः | आशावान् / उम्मीद से भरा[cite: 2] |
| चक्षुर्हीनः | नेत्रहीनः | अंधा / दृष्टिहीन[cite: 2] |
| लोकयात्रा | जीवनयात्रा | सांसारिक जीवन-यात्रा[cite: 2] |
| प्रीतः | प्रसन्नः | खुश / प्रसन्न[cite: 2] |
तत् श्रुत्वा राजा अचिन्तयत्- "लोके चक्षुर्दानं दुष्करमेव। नूनम् ईदृशं दानम् इच्छन् अयं याचकः केनापि प्रेरितः स्यात् ! अथवा भवतु नाम किं बहु चिन्तनेन?" इति विचार्य राजा अभाषत "भो मित्र ! किमेकेन चक्षुषा, अहं भवते चक्षुर्द्वयमेव प्रयच्छामि इति।" राज्ञः नेत्रदानार्थं निश्चयं ज्ञात्वा अमात्याः विषण्णाः भूत्वा अवदन्- महाराज ! अलम् एतावता दुस्साहसेन, प्रभूतं धनमेव दीयताम्।
🇮🇳 सम्पूर्ण-हिन्दी-अनुवादः:
यह सुनकर राजा ने सोचा—"संसार में नेत्रदान अत्यंत कठिन है[cite: 2]। निश्चित ही ऐसा दान चाहने वाला यह याचक किसी के द्वारा प्रेरित किया गया होगा! अथवा जो भी हो, अत्यधिक सोचने से क्या लाभ[cite: 2]?" यह सोचकर राजा ने कहा—"हे मित्र! एक आँख से क्या होगा, मैं आपको दोनों ही आँखें प्रदान करता हूँ[cite: 2]।" राजा के नेत्रदान के निश्चय को जानकर मंत्री दुःखी होकर बोले—"महाराज! इतना दुस्साहस मत कीजिए, बहुत सा धन ही दे दीजिए[cite: 2]।"
📖 कठिन-शब्दाः एवं शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| दुष्करम् | कठिनम् | अत्यंत कठिन[cite: 2] |
| अमात्याः | मंत्रिणः | मंत्रीगण[cite: 2] |
| विषण्णाः | खिन्नाः / दुःखिताः | दुःखी / उदास[cite: 2] |
| प्रभूतम् | प्रचुरम् / अत्यधिकम् | अत्यधिक / बहुत सारा[cite: 2] |
दास्यामीति प्रतिज्ञाय योऽन्यथा कुरुते मनः।
कार्पण्यानिश्चितमतेः कः स्यात् पापतरस्ततः॥
🎯 अन्वयः:
'दास्यामि' इति प्रतिज्ञाय यः मनः अन्यथा कुरुते, कार्पण्य-अनिश्चितमतेः ततः पापतरः कः स्यात्?
🇮🇳 अन्वयस्य हिन्दी-अर्थः:
"दूंगा" ऐसी प्रतिज्ञा करके जो अपने मन को बदल लेता है (फिर जाने से मुकर जाता है), उस कृपण (चंचल मन वाले) व्यक्ति से बढ़कर पापी और कौन हो सकता है[cite: 2]?
📖 कठिन-शब्दाः एवं शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| कार्पण्यम् | कृपणता / हृदयस्य दुर्बलता | कंजूसी / मन की कमजोरी[cite: 2] |
| पापतरः | अधिक पापी | बड़ा पापी[cite: 2] |
नाहं स्वर्गं न मोक्षं वा कामये किन्तु आर्त्तानां परित्राणाय एव मे निश्चयः। अस्य याच्ञा वृथा मा अस्तु इत्युक्त्वा स राजा वैद्योक्तविधिना नीलोत्पलम् इव एकं चक्षुः शनैः अक्षतम् उत्पाट्य प्रीत्या याचकाय समर्पितवान्। सः अपि तत् नेत्रं यथास्थानम् अस्थापयत्। ततो महीपालः द्वितीयं नेत्रमपि शनैः निष्कास्य तस्मै अयच्छत्।
🇮🇳 सम्पूर्ण-हिन्दी-अनुवादः:
"मैं न तो स्वर्ग चाहता हूँ और न ही मोक्ष की कामना करता हूँ, बल्कि पीड़ितों (दुःखियों) के दुःखों को दूर करने के लिए ही मेरा यह निश्चय है[cite: 2]। इस याचक की प्रार्थना व्यर्थ न जाए"—ऐसा कहकर राजा ने वैद्य द्वारा बताई गई विधि से नीले कमल के समान एक आँख को धीरे से बिना किसी क्षति (अक्षत) के निकालकर प्रेमपूर्वक याचक को सौंप दिया[cite: 2]। उसने (इंद्र ने) भी उस आँख को सही स्थान पर स्थापित कर लिया[cite: 2]। इसके बाद राजा ने दूसरी आँख भी धीरे से निकालकर उसे दे दी[cite: 2]।
📖 कठिन-शब्दाः एवं शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| परित्राणाय | रक्षणाय | रक्षा / कल्याण के लिए[cite: 2] |
| नीलोत्पलम् | नीलं कमलम् | नीला कमल[cite: 2] |
| अक्षतम् | अक्षत रूपेण | बिना चोट पहुँचाए[cite: 2] |
| उत्पाट्य | निष्कास्य | निकालकर[cite: 2] |
| महीपालः | राजा / भूपतिः | राजा[cite: 2] |
अथ विस्मितः शक्रः अचिन्तयत्- अहो धृतिः ! अहो सत्त्वम् ! अहो सत्त्वहितैषिता ! नायं चिरं परिक्लेशम् अनुभवितुम् अर्हति। अतः प्रयतिष्ये चक्षुषोऽस्य पुनः प्रत्यारोपणाय इति।
कतिपयैः दिनैः व्रणविरोपणे जाते एकदा राजा सरोवरस्य समीपे विहरति स्म। तदा तस्य पुरतः पुनः देवराजः शक्रः उपस्थितः भूत्वा तस्य त्यागवृत्तिं प्रशंसन् अवदत्-
🇮🇳 सम्पूर्ण-हिन्दी-अनुवादः:
इसके बाद आश्चर्यचकित हुए इंद्र ने सोचा—"अहो! कैसा धैर्य है! अहो! कैसा महान् चरित्र है! अहो! प्राणियों के प्रति कैसी कल्याण-भावना है[cite: 2]! यह राजा अधिक समय तक कष्ट भोगने योग्य नहीं है[cite: 2]। इसलिए मैं इसकी आँखों के पुनः प्रत्यारोपण (वापस लगाने) का प्रयास करूँगा[cite: 2]।"
कुछ दिनों में घाव के भर जाने पर एक बार राजा तालाब के पास घूम रहे थे[cite: 2]। तब उनके सामने पुनः देवराज इंद्र उपस्थित होकर उनकी त्याग भावना की प्रशंसा करते हुए बोले—[cite: 2]
📖 कठिन-शब्दाः एवं शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| विस्मितः | चकितः | हैरान / आश्चर्यचकित[cite: 2] |
| धृतिः | धैर्यम् | धैर्य[cite: 2] |
| सत्त्वहितैषिता | प्राणिनां कल्याणस्य इच्छा | जीवों के कल्याण की इच्छा[cite: 2] |
| व्रणविरोपणे | घाते स्वस्थे जाते | घाव के भर जाने पर[cite: 2] |
| प्रत्यारोपणाय | पुनः स्थापनाय | दोबारा लगाने के लिए[cite: 2] |
शक्रोऽहमस्मि देवेन्द्रस्त्वत्समीपमुपागतः।
वरं वृणीष्व राजर्षे ! यदिच्छसि तदुच्यताम्॥
🎯 अन्वयः:
राजर्षे ! अहम् देवेन्द्रः शक्रः त्वत् समीपम् उपागतः अस्मि। वरम् वृणीष्व, यत् इच्छसि तत् उच्यताम्।
🇮🇳 अन्वयस्य हिन्दी-अर्थः:
"हे राजर्षि! मैं देवराज इंद्र आपके पास आया हूँ[cite: 2]। वर माँगो, जो आप चाहते हैं वह कहो[cite: 2]।"
एवम् उक्तेन राज्ञा नेत्रार्थं प्रार्थिते सति शक्रस्य प्रभावेण आत्मनः सत्यपुण्यबलेन च तस्य प्रथमम् एकं चक्षुः प्रतिष्ठितम् अभवत् ततः द्वितीयमपि। भूयः प्रीतः शक्रः वरम् अयच्छत्- शतयोजनपर्यन्तं शैलानां पारं च द्रष्टुं समर्थः भव इति। इति उक्त्वा शक्रः तत्रैव अन्तर्हितः अभवत्।
🇮🇳 सम्पूर्ण-हिन्दी-अनुवादः:
ऐसा कहने पर राजा द्वारा नेत्रों के लिए प्रार्थना करने पर इंद्र के प्रभाव से और अपने सत्य तथा पुण्य के बल से पहले उनकी एक आँख वापस आ गई और फिर दूसरी भी[cite: 2]। अत्यधिक प्रसन्न हुए इंद्र ने वरदान दिया—"सो योजन (सौ योजन की दूरी) तक और पर्वतों के पार भी देखने में समर्थ होओ[cite: 2]।" ऐसा कहकर इंद्र वहीं अदृश्य हो गए[cite: 2]।
📖 कठिन-शब्दाः एवं शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| प्रतिष्ठितम् | पुनः स्थापितम् | पुनः स्थापित हुई[cite: 2] |
| भूयः | पुनः / अत्यधिकम् | पुनः / अत्यधिक[cite: 2] |
| शैलानाम् | पर्वतानाम् | पहाड़ों के[cite: 2] |
| अन्तर्हितः | अदृश्यः | गायन / अदृश्य[cite: 2] |
धनस्य निःसारलघोः स सारो यद् दीयते लोकहितोन्मुखेन।
निधानतां याति हि दीयमानम् अदीयमानं निधनैकनिष्ठम्॥
🎯 अन्वयः:
निःसारलघोः धनस्य सः सारः यत् लोकहित-उन्मुखेन दीयते। दीयमानम् (धनम्) निधानताम् हि याति, अदीयमानम् (धनम्) निधन-एकनिष्ठम् (भवति)।
🇮🇳 अन्वयस्य हिन्दी-अर्थः:
इस असार (क्षणिक) और तुच्छ धन का एकमात्र वास्तविक सार यही है कि इसे जनकल्याण में समर्पित कर दिया जाए[cite: 2]। दान दिया जाने वाला धन अक्षय संपत्ति (अमर यश) बन जाता है, जबकि न दिया जाने वाला (संग्रह करके रखा गया) धन केवल विनाश को ही प्राप्त होता है[cite: 2]।
📖 कठिन-शब्दाः एवं शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| निःसारलघोः | तुच्छस्य / असारस्य | तुच्छ/असार धन का[cite: 2] |
| निधानताम् | सम्पन्नताम् / कोषत्वम् | अक्षय धन / निधि[cite: 2] |
| निधनैकनिष्ठम् | विनाशः एव भाग्यं यस्य तत् | विनाश ही जिसकी नियति है[cite: 2] |
📝 अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि (NCERT Solutions)
1. एकपदेन उत्तरत (एक पद में उत्तर दीजिए):
(क) भगवान् बोधिसत्त्वः कथं शिवीनां राजा अभवत् ?
उत्तरम्: बहुजन्मार्जितपुण्यफलैः
(ख) सकलं ब्रह्माण्डं कीदृशं सञ्जातम् ?
उत्तरम्: व्याकुलम्
(ग) के सौभाग्यशालिनः यान् याचकाः शरीरस्य अङ्गानि याचन्ते ?
उत्तरम्: दानवीराः
(घ) राजा वैद्योक्तविधिना नीलोत्पलम् इव किम् अक्षतम् उदपाटयत् ?
उत्तरम्: चक्षुः / एकं चक्षुः
(ङ) राजा कस्य समीपे विहरति स्म ?
उत्तरम्: सरोवरस्य
(च) राज्ञः काम् आकर्ण्य देशान्तरेभ्योऽपि जनाः आयान्ति स्म ?
उत्तरम्: दानशीलताम्
(छ) भूयः प्रीतः शक्रः किम् अयच्छत् ?
उत्तरम्: वरम्
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत (पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए):
(क) बोधिसत्त्वः बाल्यात् एव कीदृशः आसीत् ?
उत्तरम्: बोधिसत्त्वः बाल्यात् एव वृद्धोपसेवी, विनयशीलः, शास्त्रपारङ्गतः च आसीत्।
(ख) शिवेः राज्ये याचकाः किं लब्ध्वा सन्तुष्टाः अभवन् ?
उत्तरम्: शिवेः राज्ये याचकाः अन्न-पान-वसन-रजत-सुवर्णादिकानि अभीष्टानि वस्तूनी लब्ध्वा सन्तुष्टाः अभवन्।
(ग) नेत्रहीनयाचकस्य रूपं धृत्वा शक्रः बोधिसत्त्वं किम् अवदत् ?
उत्तरम्: शक्रः अवदत्- "हे राजन् ! भवतः दानवीरताम् आकर्ण्य आशान्वितः भवत्समीपम् आगतोऽस्मि। चक्षुर्हीनः अहं कथम् एतत् जगत् पश्येयम्?"
(घ) सकलं ब्रह्माण्डं किं ज्ञात्वा व्याकुलं जातम् ?
उत्तरम्: राज्ञः स्वेषु गात्रेष्वपि निरासक्तिं विज्ञाय सकलं ब्रह्माण्डं व्याकुलं जातम्।
(ङ) राजा प्रीत्या याचकाय किं समर्पितवान् ?
उत्तरम्: राजा प्रीत्या याचकाय वैद्योक्तविधिना अक्षतं चक्षुर्द्वयम् एव समर्पितवान्।
(च) शक्रः किं वरम् अयच्छत् ?
उत्तरम्: शक्रः "शतयोजनपर्यन्तं शैलानां पारं च द्रष्टुं समर्थः भव" इति वरम् अयच्छत्।
3. स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं क्रियताम्:
(क) अभीष्टवस्तूनी प्राप्य याचकाः सन्तुष्टाः आसन्।
प्रश्नः: अभीष्टवस्तूनी प्राप्य के सन्तुष्टाः आसन्?
(ख) दानशालासु विचरन् राजा अचिन्तयत्।
प्रश्नः: कुत्र / कासु विचरन् राजा अचिन्तयत्?
(ग) राजा पुत्रवत् प्रजाः पालयति स्म।
प्रश्नः: राजा कथम् प्रजाः पालयति स्म?
(घ) स राजा तान् अकथयत्।
प्रश्नः: स राजा कान् अकथयत्?
(ङ) राजा याचकेभ्यः दानं ददाति स्म।
प्रश्नः: राजा केभ्यः दानं ददाति स्म?
4. अधोलिखित-प्रश्नान् यथानिर्देशम् उत्तरत:
(क) 'शक्रः तत्रैव अन्तर्हितः अभवत्।' अस्मिन् वाक्ये विशेषणपदं किम् ? ➔ अन्तर्हितः
(ख) 'सत्यबलेन तस्य चक्षुः प्रतिष्ठितम् अभवत्।' अस्मिन् वाक्ये कर्तृपदम् किम् ? ➔ चक्षुः
(ग) 'जनाः तं देशम् आयान्ति स्म।' अस्मिन् वाक्ये विशेष्यपदं किम् ? ➔ देशम्
(घ) 'अर्थिनः तु धनलाभमात्रेण सन्तोषं भजन्ते।' अत्र 'परितोषः' इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम् ? ➔ सन्तोषम्
(ङ) 'शतयोजनपर्यन्तं शैलानां पारं च द्रष्टुं समर्थः भव।' अत्र 'असमर्थः' अस्य विलोमपदं किम् ? ➔ समर्थः
(च) 'बोधिसत्त्वः शिवीनां राजा अभवत्।' अत्र क्रियापदं किम् ? ➔ अभवत्
5. समुचितम् अर्थं मेलयत (समानार्थक शब्द मिलाएँ):
- (क) शैलानाम् ➔ पर्वतानाम्
- (ख) शक्रः ➔ इन्द्रः
- (ग) आत्मनः ➔ स्वस्य
- (घ) चक्षुः ➔ नेत्रम्
- (ङ) उत्पाट्य ➔ निष्कास्य
- (च) महीपालः ➔ भूपतिः
6. अधोलिखितानि वाक्यानि कथाक्रमानुसारं लिखत:
- (ज) अथ एकदा भगवान् बोधिसत्त्वः बहुजन्मार्जितपुण्यफलैः शिवीनां राजा अभवत्।
- (क) स बाल्यात् एव वृद्धोपसेवी, विनयशीलः शास्त्रपारङ्गतः च आसीत्।
- (च) जनकल्याणकर्मसु रतः असौ पुत्रवत् प्रजाः पालयति स्म।
- (ग) कारुण्य-औदार्यादिसद्गुणोपेतः स नगरस्य समन्ततः धन-धान्यसमृद्धाः दानशालाः अकारयत्।
- (छ) तत्र अर्थिनां समूहः अन्न-पान-वसन-रजत-सुवर्णादिकानि अभीष्टानि वस्तूनी प्राप्य सन्तुष्टः अभवत्।
- (ख) राज्ञः दानशीलताम् आकर्ण्य देशान्तरेभ्योऽपि जनाः तं देशम् आयान्ति स्म।
- (ङ) अथ कदाचित् दानशालासु विचरन् स राजा बहुधनलाभेन सन्तुष्टानाम् अर्थिनां विरलसङ्ख्यां विलोक्य अचिन्तयत्।
- (घ) मम अर्थिनः तु धनलाभमात्रेण सन्तोषं भजन्ते।
7. प्रसङ्गानुसारम् अर्थं चिनुत:
(क) राज्ञः दानशीलताम् आकर्ण्य जनाः तं देशम् आयान्ति स्म। ➔ (i) श्रुत्वा
(ख) राज्ञः निश्चयं ज्ञात्वा अमात्याः विषण्णाः भूत्वा अवदन्। ➔ (ii) खिन्नाः
(ग) यदि भवान् प्रीतः, तदा त्वत्तः एकस्य चक्षुषः दानम् इच्छामि। ➔ (iii) नेत्रस्य
(घ) एकदा राजा सरोवरस्य समीपे विहरति। ➔ (i) तडागस्य
(ङ) न अयं चिरं परिक्लेशम् अनुभवितुम् अर्हति। ➔ (i) एषः
(च) सकलं ब्रह्माण्डं व्याकुलं सञ्जातम्। ➔ (i) सम्पूर्णम्
8. समस्तपदानि लिखत (समास विग्रह के समस्त पद):
- (क) निर्गता बाधा यस्याः सा ➔ निर्बाधा
- (ख) धान्येन समृद्धाः ➔ धान्यसमृद्धाः
- (ग) विनयः शीलं यस्य सः ➔ विनयशीलः
- (घ) वृद्धान् उपसेवितुं शीलं यस्य सः ➔ वृद्धोपसेवी
- (ङ) शक्रस्य प्रभावेण ➔ शक्रप्रभावेण
- (च) शास्त्रेषु पारङ्गतः यः सः ➔ शास्त्रपारङ्गतः
9. सूक्तीनाम् सम्बद्धाः पाठान्तर्गतपङ्क्तयः लिखत:
(क) न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
पाठस्य पङ्क्तिः: नाहं स्वर्गं न मोक्षं वा कामये किन्तु आर्त्तानां परित्राणाय एव मे निश्चयः।
(ख) हुतं च दत्तं च सदैव तिष्ठति।
पाठस्य पङ्क्तिः: दीयमानम् निधानतां याति हि।
(ग) क्षयम् आयाति सञ्चयात्।
पाठस्य पङ्क्तिः: अदीयमानं निधनैकनिष्ठम्।
10. वाक्यानां सम्मुखे उचित-भावस्य सम्मेलनं कुरुत:
- (क) असौ पुत्रवत् प्रजाः पालयति स्म। ➔ स्नेहः
- (ख) सः नगरस्य समन्ततः दानशालाः अकारयत्। ➔ उदारता
- (ग) ममार्थिनस्तु धनलाभमात्रेण सन्तोषं लभन्ते। ➔ निराशा / दुःखम्
- (घ) राज्ञः नेत्रदाननिश्चयं ज्ञात्वा अमात्याः विषण्णाः जाताः। ➔ दुःखम्
- (ङ) अहं भवते चक्षुर्द्वयमेव प्रयच्छामि। ➔ दानवीरता