NCERT Class 9 Sanskrit Chapter 7 Upayam Chintayet Pragya Tathapayam Ch Chintayet Explanation & Solutions

सप्तमः पाठः: उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्

(पंचतंत्र - मित्रभेदः)
भाग 1: दो मित्रों का प्रस्थान
कस्मिंश्चिद्देशे धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रतिवसतः स्म। अथ कदाचित् पापबुद्धिना चिन्तितं यत् अहं तावान् मूर्खः दरिद्रतया पीडितश्च। अतः एनं धर्मबुद्धिं स्वीकृत्य अन्यं देशं गच्छामि, तत्र अस्य आश्रयणेन धनं सम्पादयामि, अनन्तरम् एनमपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि इति।

अथ अन्यस्मिन् अहनि धर्मबुद्धिम् उपेत्य आह— पापबुद्धिः: भो मित्र! यदा भवान् वृद्धः भवति तदा 'बाल्ये यौवने वा मया एवं कृतम्' इति वक्तुं योग्यं किं कार्यं स्मरति? भवता अन्यः देशः न दृष्टः एव चेत् भवतः शिशून् अन्यदेशसम्बन्धे कां कथां वक्ष्यति? उक्तमेव— देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि येन न ज्ञातम्। भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम्॥

एवमेव— विद्यां वित्तं शिल्पं तावन्नाप्नोति मानवः सम्यक्। यावद् व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः ॥ अतः आवां देशान्तरं गत्वा धनम् अर्जयित्वा आगच्छाव इति।

अथ तस्य तद्वचनम् आकर्ण्य प्रहृष्टमनाः धर्मबुद्धिः आह— अस्तु तावत् गुरुजनाज्ञया गच्छावः। (ततस्तौ गुरुजनानाम् अनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ। पापबुद्धिः धर्मबुद्धिप्रभावेण प्रभूतं धनं सम्पादितवान्)।
हिंदी अर्थ: किसी देश में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नामक दो मित्र रहते थे। एक दिन पापबुद्धि ने सोचा कि मैं बहुत मूर्ख और गरीबी से पीड़ित हूँ। इसलिए इस धर्मबुद्धि को साथ लेकर दूसरे देश जाता हूँ, वहाँ इसके आश्रय से धन कमाता हूँ, और बाद में इसे भी ठगकर सुखी होता हूँ। फिर एक दिन धर्मबुद्धि के पास जाकर कहा— हे मित्र! जब आप बूढ़े हो जाएंगे, तो 'बचपन या जवानी में मैंने ऐसा किया था' ऐसा कहने योग्य कौन सा काम याद करेंगे? आपने दूसरा देश नहीं देखा, तो आपके बच्चों को दूसरे देशों के बारे में क्या बताएंगे? कहा भी है— जिसने दूसरे देशों की अनेक भाषाओं और वेशभूषा आदि को नहीं जाना, धरती पर घूमने वाले उस मनुष्य का जन्म व्यर्थ है। जब तक मनुष्य प्रसन्न होकर देश-देशांतरों में नहीं घूमता, तब तक विद्या, धन और कला को ठीक से प्राप्त नहीं कर पाता। इसलिए हम दोनों दूसरे देश जाकर धन कमाकर आएं। उसकी बात सुनकर प्रसन्न मन वाले धर्मबुद्धि ने कहा— ठीक है, गुरुजनों की आज्ञा से चलते हैं। (फिर दोनों ने गुरुजनों की अनुमति लेकर शुभ दिन में विदेश के लिए प्रस्थान किया। पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि के प्रभाव से बहुत सारा धन कमाया।)
शब्द अर्थ
प्रतिवसतः स्मरहते थे
वञ्चयित्वाठगकर
प्रभूतं धनम्बहुत सारा धन
सम्पादितवान्कमाया
प्रहृष्टमनाःप्रसन्न मन वाला
भाग 2: धन को छिपाना
पापबुद्धिः: मित्र! आवाभ्याम् इदानीं प्रचुरं धनम् उपार्जितम्। अत्र आगत्य वर्षाणि व्यतीतानि, सर्वं धनं स्वीकृत्य स्वग्रामं गच्छावः।

धर्मबुद्धिः: अथ किम्। तथैव अस्तु।

(यदा तौ स्वनगरसमीपम् आगतवन्तौ तदा) पापबुद्धिः: भद्र! एतत् सर्वं धनं गृहं प्रति नेतुं न उचितम्। अतः एतद् धनम् अत्रैव गहनारण्ये कुत्रापि भूमौ निक्षिप्य किञ्चिन्मात्रम् आदाय गृहं प्रविशावः।

धर्मबुद्धिः: सत्यमेव अभिहितं भवता, तथैव कुर्वः।

(यथा द्वाभ्यां चिन्तितं तथैव भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ। अन्यस्मिन् अहनि पापबुद्धिः निशीथे अटव्यां गत्वा तत् सर्वं वित्तं समादाय गर्तं पूरयित्वा स्वभवनं गतवान्।)
हिंदी अर्थ: पापबुद्धि ने कहा— मित्र! अब हम दोनों ने बहुत धन कमा लिया है। यहाँ आए कई वर्ष बीत गए, सारा धन लेकर अपने गाँव चलें। धर्मबुद्धि ने कहा— क्यों नहीं, ऐसा ही होगा। (जब वे दोनों अपने नगर के समीप आए तब) पापबुद्धि ने कहा— भाई! यह सारा धन घर ले जाना उचित नहीं है। इसलिए इस धन को यहीं घने जंगल में कहीं ज़मीन में गाड़कर थोड़ा सा लेकर घर चलते हैं। धर्मबुद्धि ने कहा— आपने सत्य ही कहा है, ऐसा ही करते हैं। (जैसा दोनों ने सोचा था वैसे ही ज़मीन खोदकर वहीं धन छिपाकर अपने घर चले गए। दूसरे दिन पापबुद्धि आधी रात को जंगल में जाकर वह सारा धन लेकर गड्ढा भर दिया और अपने घर चला गया।)
शब्द अर्थ
प्रचुरं धनम्बहुत सारा धन
निक्षिप्यरखकर
निशीथेआधी रात में
अटव्याम्जंगल में
गर्तम्गड्ढे को
भाग 3: धोखाधड़ी और झगड़ा
(अथ कतिचिद् दिनानन्तरम्) पापबुद्धिः: सखे! मम कुटुम्बे बहवः जनाः सन्ति, धनाभावात् कष्टम् अनुभवामि। अतः तत्र गत्वा किञ्चिन्मात्रं धनम् आनयावः।

धर्मबुद्धिः: अस्तु मित्र! गच्छावः।

(अथ द्वावपि गत्वा तत्स्थानं यावत् खनतः तावद् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ। अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् उक्तवान्) पापबुद्धिः: भोः धर्मबुद्धे! त्वयैव अपहृतम् एतद्धनं, नान्येन। तत् प्रयच्छ मे तदर्धम्। अन्यथा अहं राजकुलं निवेदयिष्यामि।

धर्मबुद्धिः: भोः दुरात्मन्! मा मैवं वद। धर्मबुद्धिः खलु अहम्। न एतत् चौरकर्म करोमि। मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्। आत्मवत् सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः॥

(एवं द्वावपि विवदमानौ धर्माधिकारिणं निकषा गतौ) धर्माधिकारी: ननु न कोऽपि साक्षी युवाभ्याम् अन्यतरस्य चौरकर्मणः। अतः यत्र मानुषप्रमाणम् अनुपलब्धं तत्र वनदेवता एव न्यायनिर्णयं करिष्यति। अतः प्रातःकाले युवाम् अस्माभिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्। तत्रैव निर्णयः भविष्यति।
हिंदी अर्थ: (फिर कुछ दिनों के बाद) पापबुद्धि ने कहा— मित्र! मेरे परिवार में बहुत लोग हैं, धन के अभाव में कष्ट हो रहा है। इसलिए वहाँ जाकर थोड़ा सा धन ले आएं। धर्मबुद्धि ने कहा— ठीक है मित्र, चलते हैं। (फिर दोनों वहाँ जाकर जैसे ही ज़मीन खोदते हैं, वैसे ही खाली बर्तन (गड्ढा) देखते हैं। इस बीच पापबुद्धि अपना सिर पीटकर कहने लगा) पापबुद्धि— अरे धर्मबुद्धि! तुमने ही यह धन चुराया है, किसी और ने नहीं। इसलिए मुझे इसका आधा हिस्सा दो, नहीं तो मैं राजा के पास शिकायत करूँगा। धर्मबुद्धि ने कहा— अरे दुष्ट! ऐसा मत बोलो। मैं धर्मबुद्धि हूँ, मैं चोरी नहीं करता। माता के समान पराई स्त्रियों में, पत्थर के टुकड़े के समान पराए धन में, और अपने समान सभी प्राणियों में धर्मबुद्धि वाले लोग देखते हैं। (इस प्रकार दोनों झगड़ते हुए धर्माधिकारी (न्यायाधीश) के पास गए) धर्माधिकारी ने कहा— तुम दोनों में से किसी के चोरी करने का कोई गवाह नहीं है। इसलिए जहाँ मनुष्यों का प्रमाण नहीं मिलता, वहाँ वनदेवता ही न्याय का निर्णय करेंगी। इसलिए सुबह हमारे साथ उस वन प्रदेश में चलो। वहीं निर्णय होगा।
शब्द अर्थ
रिक्तं भाण्डम्खाली बर्तन
दुरात्मन्दुष्ट
लोष्ठवत्मिट्टी/पत्थर के टुकड़े के समान
वीक्षन्तेदेखते हैं
धर्माधिकारीन्यायाधीश
भाग 4: वृक्ष के कोटर में छिपना
(अत्रान्तरे पापबुद्धिः गृहं गत्वा स्वजनकं प्रबोधितवान्) पापबुद्धिः: तात! मया धर्मबुद्धेः प्रभूतः अर्थः चोरितः। भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति, अन्यथा अस्माकं प्राणैः सह यास्यति।

पिता: वत्स! द्रुतं वद, अहं किं करवाणि येन तद् द्रव्यं स्थिरं तिष्ठेत्।

पापबुद्धिः: तात! अस्ति वनप्रदेशे महाशमी नाम वृक्षः। तस्मिन् महाकोटरम् अस्ति। तत्र भवान् साम्प्रतम् एव प्रविशतु। ततः प्रभाते यदा अहं सत्यश्रावणाय निवेदयामि, तदा भवता वक्तव्यं यद् धर्मबुद्धिः चौर इति।

(तथा कृते, प्रातःकाले स्नात्वा पापबुद्धिः धर्मबुद्धिना धर्माधिकारिणा च सह न्यायार्थं वनदेवतायाः समीपम् उपागतः। अन्येऽपि सामाजिकाः तद् द्रष्टुम् आगताः)

पापबुद्धिः: आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च। अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम्॥ भगवति वनदेवते! आवयोः मध्ये यः चौरः त्वं कथय।

पिता (शमीकोटरस्थः): भोः! शृणुत, शृणुत! धर्मबुद्धिना हृतम् एतद्धनम्।

(तद् आकर्ण्य ते सर्वे जनाः विस्मयेन उत्फुल्ललोचनाः सञ्जाताः)
हिंदी अर्थ: (इस बीच पापबुद्धि घर जाकर अपने पिता को जगाया) पापबुद्धि— पिताजी! मैंने धर्मबुद्धि का बहुत सारा धन चुराया है। अगर आप मेरे कहे अनुसार बोलेंगे तो वह धन मेरे पास सुरक्षित रहेगा, नहीं तो हमारी जान भी जाएगी। पिता ने कहा— बेटा! जल्दी बताओ, मैं क्या करूँ जिससे वह धन सुरक्षित रहे। पापबुद्धि ने कहा— पिताजी! जंगल में महाशमी नाम का वृक्ष है। उसमें बड़ा सा कोटर (खोखला हिस्सा) है। वहाँ आप अभी चले जाओ। फिर सुबह जब मैं सच बोलने के लिए कहूँगा, तब आपको बोलना होगा कि धर्मबुद्धि ने चोरी की है। ऐसा होने पर, सुबह नहाकर पापबुद्धि, धर्मबुद्धि और धर्माधिकारी के साथ न्याय के लिए वनदेवता के पास गया। और भी कई लोग उसे देखने आए थे। पापबुद्धि ने कहा— सूर्य, चंद्रमा, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय और यम, दिन और रात, और दोनों संध्याएँ— ये सब मनुष्य के आचरण को जानते हैं। हे वनदेवी! हम दोनों में जो चोर है, उसे आप बताइए। पिता (शमी के कोटर से) बोले— सुनो, सुनो! धर्मबुद्धि ने यह धन चुराया है। यह सुनकर वहाँ मौजूद सभी लोग आश्चर्य से आँखें फाड़कर देखने लगे।
शब्द अर्थ
कोटरम्पेड़ का खोखला हिस्सा
साम्प्रतम् एवअभी से ही
उत्फुल्ललोचनाःआश्चर्य से फटी हुई आँखों वाले
नरस्य वृत्तम्मनुष्य का आचरण
भाग 5: सत्य की विजय
सर्वे जनाः: धनापहरणदोषहेतोः शास्त्रविहितप्रकारेण धर्मबुद्धये दण्डः दातव्यः।

धर्मबुद्धिः: इदं मिथ्याभाषितम् अस्ति। न अहं चोरितवान्। अहम् एतत् शमीकोटरं वह्निभोज्यद्रव्यैः परिवेष्ट्य वह्निना प्रज्वालयामि।

(तथा करोति। अथ ज्वलति तस्मिन् शमीकोटरे अर्धदग्धशरीरः स्फुटितेक्षणः करुणं विलपन् पापबुद्धिपिता बहिरागतः)

जनाः (साश्चर्यम्): भोः! किमिदम्? किमिदम्?

पिता पापबुद्धेः: एतत् सर्वम् अपि पापबुद्धेः चेष्टितम्। (इत्युक्त्वा मृतः)

धर्माधिकारी: एष पापबुद्धिः दण्डनीयः।

(राजपुरुषाः नियमानुसारं पापबुद्धिं दण्डितवन्तः धर्मबुद्धिं प्रशंसितवन्तः च)

सर्वे जनाः: भो धर्मबुद्धे! त्वया सम्यक् कृतम्। पापबुद्धेः व्यर्थपाण्डित्यात् पिता वह्निना घातितः। अतः साधुक्तम् — उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्।
हिंदी अर्थ: सभी लोगों ने कहा— धन चुराने के दोष के कारण शास्त्रों में बताए गए तरीके से धर्मबुद्धि को दंड दिया जाना चाहिए। धर्मबुद्धि ने कहा— यह झूठ बोला गया है। मैंने चोरी नहीं की है। मैं इस शमी के कोटर को जलने वाली चीज़ों से घेरकर आग लगा देता हूँ। (ऐसा ही करता है। फिर उस शमी के कोटर के जलने पर आधा जला शरीर और फटी आँखों वाला पापबुद्धि का पिता दयनीय रूप से विलाप करता हुआ बाहर आया) लोगों ने (आश्चर्य से) कहा— अरे! यह क्या है? यह क्या है? पापबुद्धि के पिता ने कहा— यह सब पापबुद्धि की ही करतूत है। (इतना कहकर वह मर गया)। धर्माधिकारी ने कहा— यह पापबुद्धि दंड के योग्य है। (राजा के लोगों ने नियम के अनुसार पापबुद्धि को दंड दिया और धर्मबुद्धि की प्रशंसा की)। सभी लोग बोले— हे धर्मबुद्धि! तुमने अच्छा किया। पापबुद्धि की व्यर्थ की चतुराई से उसके पिता की आग से मृत्यु हो गई। इसलिए ठीक ही कहा गया है— बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह उपाय भी सोचे और (दूसरों के) अपाय (नुकसान) की भी सोचे।
शब्द अर्थ
मिथ्याभाषितम्झूठ बोला गया
परिवेष्ट्यघेरकर
स्फुटितेक्षणःफटी हुई आँखों वाला
व्यर्थपाण्डित्यात्व्यर्थ की चतुराई से

अभ्यास प्रश्न (उत्तर सहित)

१. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत—

(क) नरस्य वृत्तं के जानन्ति?
उत्तरम्: आदित्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, आकाश, भूमि, जल, हृदय, यम, दिनम्, रात्रिः, संध्ये च नरस्य वृत्तं जानन्ति।

(ख) धर्मबुद्धयः किं वीक्षन्ते?
उत्तरम्: धर्मबुद्धयः परदारेषु मातृवत्, परद्रव्येषु लोष्ठवत्, सर्वभूतेषु च आत्मवत् वीक्षन्ते।

(ग) कस्य जन्मनः फलं व्यर्थम्?
उत्तरम्: यः देशान्तरेषु न भ्रमति, विविधभाषाः वेषादि च न जानाति, तस्य जन्मनः फलं व्यर्थम्।

(घ) पापबुद्धिः स्वपितरं किम् उक्तवान्?
उत्तरम्: पापबुद्धिः स्वपितरम् उक्तवान् यत् तेन धर्मबुद्धेः प्रभूतः अर्थः चोरितः। यदि सः तस्य उक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं तस्मिन् स्थिरं तिष्ठति।

(ङ) प्राज्ञः किं-किं चिन्तयेत्?
उत्तरम्: प्राज्ञः उपायं तथा अपायं च चिन्तयेत्।

(च) मानवः कदा विद्यां वित्तं शिल्पं च प्राप्नोति?
उत्तरम्: यदा मानवः हृष्टः सन् भूमौ देशाद्देशान्तरं व्रजति, तदा सः विद्यां वित्तं शिल्पं च सम्यक् प्राप्नोति।

(छ) पापबुद्धिः किं चिन्तयित्वा देशान्तरं प्रस्थितः?
उत्तरम्: पापबुद्धिः चिन्तयित्वा यत् अहं धर्मबुद्धिं स्वीकृत्य अन्यं देशं गच्छामि, तत्र अस्य आश्रयणेन धनं सम्पादयामि, अनन्तरम् एनमपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि इति।

२. अधोलिखितवाक्येषु स्थूलाक्षरपदानि आश्रित्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत—

(क) एनम् अपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि।
प्रश्नः: कम् अपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि?

(ख) सर्वं धनं स्वीकृत्य स्वग्रामं गच्छावः।
प्रश्नः: सर्वं धनं स्वीकृत्य कुत्र गच्छावः?

(ग) निशीथे अटव्यां गत्वा तत् सर्वं वित्तम् आनीतवान्।
प्रश्नः: कदा अटव्यां गत्वा तत् सर्वं वित्तम् आनीतवान्?

(घ) तत् आकर्ण्य सर्वे ते जनाः विस्मयोत्फुल्ललोचनाः सञ्जाताः।
प्रश्नः: तत् आकर्ण्य सर्वे ते जनाः कीदृशाः सञ्जाताः?

(ङ) अहम् एतत् शमीकोटरं वह्निना प्रज्वालयामि।
प्रश्नः: अहम् एतत् शमीकोटरं केन प्रज्वालयामि?

३. अधोलिखितानि वाक्यानि कः कं प्रति कथयति इति लिखत—

(क) वत्स! द्रुतं वद येन तद् द्रव्यं स्थिरं तिष्ठेत्।
उत्तरम्: पापबुद्धेः पिता पापबुद्धिं प्रति कथयति।

(ख) प्रातःकाले युवामस्माभिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्।
उत्तरम्: धर्माधिकारी धर्मबुद्धिं पापबुद्धिं च प्रति कथयति।

(ग) त्वया हृतम् एतद्धनं, नान्येन।
उत्तरम्: पापबुद्धिः धर्मबुद्धिं प्रति कथयति।

(घ) भोः दुरात्मन्! मा मैवं वद।
उत्तरम्: धर्मबुद्धिः पापबुद्धिं प्रति कथयति।

(ङ) एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्।
उत्तरम्: पापबुद्धेः पिता सर्वान् जनान् प्रति कथयति।

४. उदाहरणानुसारं भूतकालिकवाक्यानि वर्तमानकालिकवाक्येषु परिवर्तयत—

(उदाहरणम् — भवानपि मया सहैव प्रभूतं धनं प्राप्तवान्। -> भवानपि मया सहैव प्रभूतं धनं प्राप्नोति।)

(क) राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः।
उत्तरम्: राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डयन्ति।

(ख) पापबुद्धिः अत्यधिकं धनं सम्पादितवान्।
उत्तरम्: पापबुद्धिः अत्यधिकं धनं सम्पादयति।

(ग) पापबुद्धिः वनदेवतायाः समीपम् आगतवान्।
उत्तरम्: पापबुद्धिः वनदेवतायाः समीपम् आगच्छति।

(घ) अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् उक्तवान्।
उत्तरम्: अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् वदति।

(ङ) सर्वे जनाः धर्मबुद्धिं प्रशंसितवन्तः।
उत्तरम्: सर्वे जनाः धर्मबुद्धिं प्रशंसन्ति।

५. श्लोकानां भावार्थान् विचिन्त्य कोष्ठकात् समुचितपदैः रिक्तस्थानानि पूरयत—

(क) सूर्यः चन्द्रः पवनः अग्निः आकाशः भूमिः जलं हृदयं यमः दिवसः रात्रिः प्रभातं सायं च मनुष्याणां सर्वविधं व्यवहारं जानन्ति। अतः वयं सर्वदा उत्तमं व्यवहारं कुमः। (व्यवहारं/पवनः/हृदयं)

(ख) यः अन्यदेशेषु न अटति, विविधदेशानां संस्कृतीः भाषाः च न जानाति, पृथिवीपृष्ठे तस्य जन्म व्यर्थ भाति। (भाषाः/व्यर्थ/अन्यदेशेषु)

(ग) सज्जनाः सर्वासु नारीषु मातरः इव, अन्येषां द्रव्येषु मृत्पिण्डम् इव, सर्वेषु प्राणिषु च स्वयम् इव चिन्तयन्ति। (द्रव्येषु/स्वयम्/मातरः)

(घ) बुद्धिमान् मनुष्यः कार्यसाधनस्य मार्गान् समस्यादरीकरणस्य कौशलानि च जानीयात्। (कौशलानि/कार्यसाधनस्य/जानीयात्)

६. उदाहरणं दृष्ट्वा अधोलिखितानां पदानां विग्रहं मेलनं वा कुरुत—

(उदाहरणम् — अर्थोपार्जनम् -> अर्थस्य उपार्जनम्)

(क) गुरुजनाज्ञया -> गुरुजनानाम् आज्ञया (षष्ठी तत्पुरुषः)

(ख) वनदेवता -> वनस्य देवता (षष्ठी तत्पुरुषः)

(ग) धनाभावात् -> धनस्य अभावात् (षष्ठी तत्पुरुषः)

(घ) बुद्धिप्रभावेण -> बुद्धेः प्रभावेण (षष्ठी तत्पुरुषः)

(ङ) धरणीपीठे -> धरण्याः पीठे (षष्ठी तत्पुरुषः)

(च) राजकुलं -> राज्ञः कुलम् (षष्ठी तत्पुरुषः)

७. अधोलिखितानि वाक्यानि कथाक्रमानुसारं पुनः लिखत—

(सही क्रम में उत्तर: घ -> ख -> ङ -> ग -> क -> च)

सही क्रम:

१. कस्मिंश्चिद्देशे धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रतिवसतः स्म। (घ)

२. ततस्तौ गुरुजनानाम् अनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ। (ख)

३. यथा द्वाभ्यां चिन्तितं तथैव भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ। (ङ)

४. द्वावपि गत्वा तत् स्थानं यावत् खनतः तावद् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ। (ग)

५. भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति। (क)

६. राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः। (च)

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