NCERT Class 9 Sanskrit Chapter 6 Manahputam Samacaret Explanation & Solutions

कक्षा ९ (संस्कृतम् - शारदा) : षष्ठः पाठः

मनःपूतं समाचरेत् (सम्पूर्ण-व्याख्या, अन्वयः, शब्दार्थाः भावार्थश्च)

📌 पाठ-परिचयः: प्रस्तुत पाठ 'मनःपूतं समाचरेत्' एनसीईआरटी (NCERT) की कक्षा 9वीं की पाठ्यपुस्तक 'शारदा' का छठवाँ पाठ है। इसमें मनुस्मृति, श्रीमद्भगवद्गीता, नीतिशतकम्, पञ्चतन्त्रम्, मालविकाग्निमित्रम् एवं किरातार्जुनीयम् जैसे विभिन्न संस्कृत ग्रन्थों से उत्कृष्ट सुभाषितों का सङ्कलन किया गया है। इन श्लोकों का मुख्य उद्देश्य हमारे आचरण और मन को पवित्र एवं दिशा-निर्देशित करना है।
प्रथमः श्लोकः
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेत् वाचं मनःपूतं समाचरेत्॥ १ ॥ (स्रोत ग्रन्थः - मनुस्मृतिः ६.४६)
अन्वयः:
दृष्टिपूतं पादं न्यसेत्, वस्त्रपूतं जलं पिबेत्, सत्यपूतां वाचं वदेत्, मनःपूतं (कार्यं) समाचरेत्।
पदम् (शब्द) संस्कृत-अर्थः / व्याकरणांशः हिन्दी-अर्थः English Meaning
दृष्टिपूतम्दृष्ट्या शुद्धम् (सम्यक् अवलोकितम्)अच्छी तरह देखकरCleansed by sight
न्यसेत्नि + √अस् (विधि० प्र०पु०ए०व०)रखे / स्थापित करेShould place
पादम्चरणम्कदम / पैरFoot / Step
वस्त्रपूतम्वस्त्रेण शोधितम्कपड़े से छानकरFiltered by cloth
सत्यपूताम्सत्येन पवित्रिताम्सत्य से पवित्र (वाणी)Purified by truth
वाचम्वाणीम् (स्त्री०द्वि०ए०व०)वाणी कोSpeech
मनःपूतम्मनसा पवित्रितम् (शुद्धम्)मन से पवित्र माना गयाCleansed by mind / conscience
समाचरेत्सम्यक् आचरणं कुर्यात्आचरण करना चाहिएShould act thoughtfully
सरलार्थः (हिन्दी अनुवाद):
मनुष्य को भली-भाँति देखकर कदम रखना चाहिए, वस्त्र से छानकर शुद्ध जल पीना चाहिए, सत्य से पवित्र वाणी बोलनी चाहिए तथा मन से पवित्र (आत्मा द्वारा स्वीकृत) कार्य का ही आचरण करना चाहिए।
विस्तृत-व्याख्या:
इस श्लोक में व्यावहारिक जीवन के चार मूलभूत स्वर्णिम नियम बताए गए हैं: १. मार्ग में चलते समय आँखों से अच्छी तरह देखकर पैर रखना चाहिए जिससे चोट या दुर्घटना न हो। २. स्वास्थ्य रक्षा के लिए जल को हमेशा छानकर पीना चाहिए। ३. वाणी सदैव सत्य एवं मीठी होनी चाहिए जिससे किसी का हृदय न दुखे। ४. जो कार्य हमारी अन्तरात्मा और मन को शुद्ध एवं उचित लगे, वही आचरण में लाना चाहिए।
द्वितीयः श्लोकः
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥ २ ॥ (स्रोत ग्रन्थः - मनुस्मृतिः ६.९२)
अन्वयः:
धृतिः, क्षमा, दमः, अस्तेयम्, शौचम्, इन्द्रियनिग्रहः, धीः, विद्या, सत्यम्, अक्रोधः (च इति) दशकं धर्मलक्षणं (भवति)।
पदम् (शब्द) संस्कृत-अर्थः / व्याकरणांशः हिन्दी-अर्थः English Meaning
धृतिःधैर्यम्धैर्य / धारण क्षमताPatience / Fortitude
क्षमासहनशीलताक्षमाशीलताForgiveness
दमःइन्द्रियाणां मनसः च नियन्त्रणम्मन तथा इन्द्रियों का दमनSelf-control / Mind control
अस्तेयम्न स्तेयम् (चोरी न करना)चोरी न करनाNot stealing
शौचम्शुचेः भावः, पावित्र्यम्शरीर एवं मन की पवित्रताPurity / Cleanliness
इन्द्रियनिग्रहःइन्द्रियाणाम् वशीकरणम्इन्द्रियों को वश में रखनाControl over senses
धीःबुद्धिःसद्बुद्धि / विवेकIntellect / Wisdom
अक्रोधःक्रोधस्य अभावःक्रोध न करनाAbsence of anger
दशकम्दश-सङ्ख्याकाः अवयवाःदस लक्षणTen characteristics
सरलार्थः (हिन्दी अनुवाद):
धैर्य, क्षमा, मन पर नियंत्रण (दम), चोरी न करना (अस्तेय), पवित्रता (शौच), इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना—ये १० धर्म के मुख्य लक्षण (पहचान) हैं।
विस्तृत-व्याख्या:
धर्म केवल कर्मकाण्ड या पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि मानव जीवन के नैतिक मूल्यों का समूह है। मनुस्मृति के अनुसार यदि मनुष्य अपने जीवन में इन १० सद्गुणों (धैर्य, क्षमा, मन-इन्द्रिय नियंत्रण, अस्तेय, पवित्रता, सद्बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध) को अपनाता है, तो वही सच्चा धार्मिक आचरण कहलाता है।
तृतीयः श्लोकः
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ ३ ॥ (स्रोत ग्रन्थः - श्रीमद्भगवद्गीता ३.२१)
अन्वयः:
श्रेष्ठः यत् यत् आचरति, इतरः जनः तत् तत् एव (आचरति)। सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते।
पदम् (शब्द) संस्कृत-अर्थः / व्याकरणांशः हिन्दी-अर्थः English Meaning
श्रेष्ठःमहान् / उत्तमः जनःमहापुरुष / श्रेष्ठ व्यक्तिGreat man / Leader
आचरतिव्यवहारं करोतिआचरण करता हैActs / Behaves
इतरः जनःसाधारणः जनःसाधारण लोगCommon people
प्रमाणम्आदर्शम् / प्रमाणत्वेनप्रमाण / आदर्शStandard / Example
अनुवर्ततेअनु + √वृत् (अनुसरणम् करोति)अनुसरण करता हैFollows / Imitates
सरलार्थः (हिन्दी अनुवाद):
श्रेष्ठ (महान) व्यक्ति जैसा-जैसा आचरण करता है, अन्य साधारण लोग भी वैसा ही आचरण करते हैं। वह महापुरुष जिसे प्रमाण या आदर्श मान लेता है, समस्त संसार उसी का अनुसरण करता है।
विस्तृत-व्याख्या:
श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक में सामाजिक नेतृत्व के उत्तरदायित्व पर प्रकाश डाला गया है। समाज के प्रतिष्ठित और श्रेष्ठ व्यक्तियों के आचरण का प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। इसलिए जिम्मेदार पदों पर आसीन व्यक्तियों को सदा आदर्श और धर्मसंगत व्यवहार ही करना चाहिए।
चतुर्थः श्लोकः
अभ्यासेन क्रियाः सर्वा अभ्यासात् सकलाः कलाः।
अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम्॥ ४ ॥ (स्रोत ग्रन्थः - सुभाषितरत्नभाण्डागारः)
अन्वयः:
सर्वाः क्रियाः अभ्यासेन (सिध्यन्ति), सकलाः कलाः अभ्यासात् (सिध्यन्ति), ध्यानमौनादि (अपि) अभ्यासात् (सिध्यति), अभ्यासस्य किम् दुष्करम् (अस्ति)?
पदम् (शब्द) संस्कृत-अर्थः / व्याकरणांशः हिन्दी-अर्थः English Meaning
अभ्यासेनपुनः पुनः अनुशीलनेननिरन्तर अभ्यास सेBy practice
सकलाः कलाःसर्वाः कलाः (सङ्गीत-शिल्पादयः)समस्त कलाएँAll arts and skills
ध्यानमौनादिध्यानं मौनं च आदि यस्य तत्ध्यान और मौन साधना आदिMeditation, silence etc.
दुष्करम्कठिनम् / असाध्यम्कठिन / असम्भवDifficult / Impossible
सरलार्थः (हिन्दी अनुवाद):
निरन्तर अभ्यास से ही सभी कार्य सिद्ध होते हैं, अभ्यास से ही समस्त कलाएँ सीखी जाती हैं, यहाँ तक कि ध्यान और मौन साधना जैसी कठिन क्रियाएँ भी अभ्यास से सधती हैं। अतः अभ्यास के लिए कुछ भी कठिन (असाध्य) नहीं है।
विस्तृत-व्याख्या:
यह श्लोक अभ्यास की अपार शक्ति को रेखांकित करता है। कोई भी व्यक्ति जन्म से ही सर्वज्ञ नहीं होता। लगन और नियमित अभ्यास से कठिन से कठिन विधा, कला और एकाग्रता को प्राप्त किया जा सकता है।
पञ्चमः श्लोकः
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैरः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥ ५ ॥ (स्रोत ग्रन्थः - नीतिशतकम् २७)
अन्वयः:
नीचैः विघ्नभयेन (कार्यं) न प्रारभ्यते खलु। मध्याः (कार्यं) प्रारभ्य विघ्नविहताः (कार्यात्) विरमन्ति। उत्तमजनाः (कार्यं) प्रारभ्य विघ्नैः पुनः पुनः अपि प्रतिहन्यमानाः (कार्यं) न परित्यजन्ति।
पदम् (शब्द) संस्कृत-अर्थः / व्याकरणांशः हिन्दी-अर्थः English Meaning
नीचैःअधमजनैः / कापुरुषैःनिम्न श्रेणी के लोगों द्वाराBy inferior people
विघ्नभयेनबाधानाम् भयतःबाधाओं के डर सेDue to fear of obstacles
विघ्नविहताःविघ्नैः बाधिताः सन्तःबाधाओं से पीड़ित होकरStruck by obstacles
विरमन्तिवि + √रम् (स्थगनं कुर्वन्ति)बीच में ही रोक देते हैंStop / Give up in middle
प्रतिहन्यमानाःप्रति + √हन् + यक् + शानच्बार-बार बाधित होने पर भीRepeatedly obstructed
उत्तमजनाःश्रेष्ठपुरुषाःउत्तम श्रेणी के लोगGreat / Noble people
न परित्यजन्तिन त्यजन्तिनहीं छोड़ते हैंDo not abandon
सरलार्थः (हिन्दी अनुवाद):
अधम (निम्न श्रेणी के) लोग बाधाओं के डर से कार्य शुरू ही नहीं करते। मध्यम श्रेणी के लोग कार्य प्रारम्भ तो कर देते हैं, किन्तु विघ्न आने पर बीच में ही छोड़ देते हैं। परन्तु उत्तम श्रेणी के (श्रेष्ठ) लोग कार्य शुरू करने के बाद बार-बार विघ्नों के आने पर भी कार्य को कभी अधूरा नहीं छोड़ते।
विस्तृत-व्याख्या:
नीतिशतक के इस प्रसिद्ध श्लोक में मनुष्यों की तीन श्रेणियाँ बताई गई हैं: १. **निम्न वर्ग:** जो असफलता के डर से प्रयास ही नहीं करते। २. **मध्यम वर्ग:** जो उत्साह में कार्य शुरू करते हैं पर पहली मुसीबत आते ही हिम्मत हार जाते हैं। ३. **उत्तम वर्ग:** जो दृढ़निश्चयी होते हैं और अंतिम सफलता मिलने तक निरंतर संघर्ष करते रहते हैं।
षष्ठः श्लोकः
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥ ६ ॥ (स्रोत ग्रन्थः - पञ्चतन्त्रम् - मित्रभेदः १४९)
अन्वयः:
लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति, 'दैवेन देयम्' इति (तु) कापुरुषाः वदन्ति। दैवं निहत्य आत्मशक्त्या पौरुषं कुरु, यत्ने कृते यदि (कार्यं) न सिध्यति, (तर्हि) अत्र कः दोषः (स्यात्)?
पदम् (शब्द) संस्कृत-अर्थः / व्याकरणांशः हिन्दी-अर्थः English Meaning
उद्योगिनम्प्रयत्नशीलम् जनम्परिश्रमी / उद्योगी पुरुष कोIndustrious / Hardworking person
पुरुषसिंहम्पुरुषेषु श्रेष्ठम् (सिंहमिव)पुरुषों में श्रेष्ठ / पराक्रमी कोLion-like courageous man
उपैतिसमीपं गच्छतिपास जाती है / प्राप्त होती हैApproaches / Reaches
कापुरुषाःकुत्सिताः पुरुषाः / कातराःकायर / अधम लोगCowards / Timid people
दैवम्भाग्यम् / विधिःभाग्यFate / Destiny
निहत्यनि + √हन् + ल्यप् (अतिक्रम्य)अतिक्रमण करके / छोड़करOvercoming / Leaving fate aside
पौरुषम्पुरुषार्थम् / श्रमम्पुरुषार्थ / कठिन परिश्रमSelf-effort / Hard work
यत्ने कृतेप्रयासे कृते सतियत्न / प्रयास करने पर भीEven after making effort
सरलार्थः (हिन्दी अनुवाद):
लक्ष्मी (सफलता व समृद्धि) उद्योगी और सिंह के समान पराक्रमी पुरुष के पास ही जाती है। 'भाग्य से ही सब कुछ मिलता है' ऐसा तो कायर लोग कहते हैं। इसलिए भाग्य पर निर्भरता छोड़कर अपनी शक्ति भर पुरुषार्थ (परिश्रम) करो। यदि पूरा यत्न करने पर भी सफलता न मिले, तो इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है।
विस्तृत-व्याख्या:
पञ्चतन्त्र का यह श्लोक आलस्य और भाग्यवादिता का खण्डन करता है। कायर लोग अपनी असफलता का दोष भाग्य पर मढ़ देते हैं, जबकि कर्मवीर अपनी मेहनत से परिस्थितियों को बदलते हैं। सच्चा सन्तोष इस बात में है कि हमने अपना शत-प्रतिशत प्रयास किया।
सप्तमः श्लोकः
पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः॥ ७ ॥ (स्रोत ग्रन्थः - मालविकाग्निमित्रम् १.२)
अन्वयः:
पुराणम् इति सर्वं साधु न (वर्तते), काव्यं नवम् इति च अपि अवद्यम् न (वर्तते)। सन्तः परीक्ष्य अन्यतरत् भजन्ते, मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः (भवति)।
पदम् (शब्द) संस्कृत-अर्थः / व्याकरणांशः हिन्दी-अर्थः English Meaning
पुराणम्पुरातनम्पुरानाOld / Ancient
साधुसमीचीनम् / उत्तमम्अच्छा / निर्दोषGood / Correct
अवद्यम्न वद्यम् (निम्नस्तरीयम्/दोषयुक्तम्)दोषयुक्त / बुराInferior / Faulty
सन्तःसज्जनाः / विद्वान्सःसज्जन / विवेकशील लोगWise / Noble people
भजन्तेस्वीकुर्वन्तिस्वीकार करते हैंAccept
मूढःमूर्खः जनःमूर्ख व्यक्तिFoolish / Unwise
परप्रत्ययनेयबुद्धिःपरप्रत्ययेन नेया बुद्धिः यस्य सःदूसरों की बुद्धि पर चलने वालाGuided by others' intellect
सरलार्थः (हिन्दी अनुवाद):
केवल 'पुराना है' इसलिए सब कुछ सही या उत्तम नहीं होता, और न ही कोई काव्य 'नया है' इसलिए दोषयुक्त (बुरा) होता है। बुद्धिमान लोग स्वयं भली-भाँति परीक्षा करके ही किसी एक को स्वीकार करते हैं, जबकि मूर्ख व्यक्ति दूसरों के बहकावे में आकर अपनी राय बनाता है।
विस्तृत-व्याख्या:
महाकवि कालिदास रचित इस श्लोक में वैचारिक स्वतंत्रता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्रेरणा दी गई है। हमें किसी बात को केवल प्राचीन या नवीन होने के आधार पर स्वीकार या अस्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि तर्क और स्व-विवेक से उसकी समीक्षा करनी चाहिए।
अष्टमः श्लोकः
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमृश्यकारिणम् गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥ ८ ॥ (स्रोत ग्रन्थः - किरातार्जुनीयम् २.३०)
अन्वयः:
सहसा क्रियां न विदधीत, अविवेकः परमापदां पदम् (भवति)। गुणलुब्धाः सम्पदः स्वयमेव विमृश्यकारिणम् वृणते।
पदम् (शब्द) संस्कृत-अर्थः / व्याकरणांशः हिन्दी-अर्थः English Meaning
सहसाअकस्मात् / बिना विचार किएअचानक / बिना सोचे-समझेSuddenly / Rashly
विदधीतवि + √धा + विधिलिङ् (कुर्यात्)करना चाहिएShould do
अविवेकःअज्ञानम् / विचारहीनताअविवेक / बिना सोच-विचार का कामLack of judgment
आपदाम् पदम्विपत्तीनाम् स्थानम्मुसीबतों का घरAbode of calamities
विमृश्यकारिणम्यः चिन्तयित्वा कार्यं करोति, तम्सोच-समझकर कार्य करने वाले कोOne who acts thoughtfully
गुणलुब्धाःगुणानाम् अभिलाषिण्यःगुणों की भूखीDesirous of virtues
सम्पदःसम्पत्तयः / समृद्धयःसम्पत्तियाँ / उपलब्धियाँWealth / Prosperity
वृणतेस्वीकुर्वन्ति / आश्रयन्तेवरण करती हैं / चुनती हैंChooses / Embraces
सरलार्थः (हिन्दी अनुवाद):
बिना सोचे-समझे अचानक कोई कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि अविवेक (विचारहीनता) परम आपत्तियों (बड़ी मुसीबतों) का स्थान होता है। गुणों की लोभी सम्पदियाँ (लक्ष्मी) विचारपूर्वक कार्य करने वाले व्यक्ति का स्वयं ही वरण (चयन) कर लेती हैं।
विस्तृत-व्याख्या:
महाकवि भारवि द्वारा रचित इस श्लोक में विचारशीलता की महत्ता बताई गई है। जल्दबाजी में लिया गया निर्णय अक्सर पश्चाताप का कारण बनता है। जो मनुष्य दूरदर्शिता और ठंडे दिमाग से सोचकर निर्णय लेता है, सफलता और समृद्धि स्वयं उसके कदम चूमती है।

Post a Comment

Previous Post Next Post