पञ्चमः पाठः : अभ्यासवशगं मनः
कक्षा 10 - संस्कृत (मणिका भाग-2) | सम्पूर्ण-श्लोकार्थाः, अन्वयः, शब्दार्थाः एवं अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि
अर्जुन उवाच -
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥1॥
🎯 अन्वयः:
वार्ष्णेय! अथ अनिच्छन् अपि अयम् पूरुषः केन प्रयुक्तः (सन्) बलात् नियोजितः इव पापम् चरति?
🇮🇳 हिन्दी-अनुवादः:
अर्जुन बोले: हे श्रीकृष्ण (वृष्णि कुल में उत्पन्न)! तो फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित होकर बलपूर्वक लगाए हुए के समान पाप का आचरण करता है?
📖 कठिन-शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| वार्ष्णेय | वृष्णि-कुलप्रसूत! (श्रीकृष्ण) | हे श्रीकृष्ण! |
| प्रयुक्तः | प्रेरितः | प्रेरित हुआ |
| पूरुषः | पुरुषः / मानवः | मनुष्य |
| अनिच्छन् | न इच्छन् (इष् + शतृ) | न चाहता हुआ भी |
| चरति | करोति / आचरति | आचरण करता है |
श्रीभगवानुवाच -
काम एषः क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्॥2॥
🎯 अन्वयः:
रजोगुणसमुद्भवः एषः कामः एषः क्रोधः (अस्ति)। (एषः) महाशनः महापाप्मा (अस्ति), इह एनम् वैरिणम् विद्धि।
🇮🇳 हिन्दी-अनुवादः:
श्रीभगवान् बोले: रजोगुण से उत्पन्न होने वाला यह 'काम' (इच्छा) ही 'क्रोध' है। यह बहुत खाने वाला (कभी तृप्त न होने वाला) और महान् पापी है। इस संसार में तुम इसे ही अपना शत्रु जानो।
📖 कठिन-शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| रजोगुणसमुद्भवः | रजोगुणात् उत्पन्नः | रजोगुण से उत्पन्न होने वाला |
| महाशनः | महत् अशनं (भोजनम्) यस्य सः | बहुत खाने वाला / अतृप्त |
| महापाप्मा | पापशीलः | महापापी |
| विद्धि | जानीहि | जानो / समझो |
| वैरिणम् | शत्रुम् | शत्रु को |
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक् शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं सः युक्तः स सुखी नरः॥3॥
🎯 अन्वयः:
यः शरीरविमोक्षणात् प्राक् इह एव कामक्रोधोद्भवम् वेगम् सोढुम् शक्नोति, सः नरः युक्तः सः (एव) सुखी (भवति)।
🇮🇳 हिन्दी-अनुवादः:
जो मनुष्य शरीर छोड़ने (मृत्यु) से पहले ही इस संसार में काम और क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग (आवेग) को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही मनुष्य योगी है और वही वास्तव में सुखी है।
📖 कठिन-शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| शरीरविमोक्षणात् | देहत्यागात् | शरीर त्यागने (मृत्यु) से |
| प्राक् | पूर्वम् | पहले |
| सोढुम् | सहनं कर्तुम् | सहन करने में |
| युक्तः | योगी / भक्तिमान् | योगी / संयमी मनुष्य |
ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥4॥
🎯 अन्वयः:
विषयान् ध्यायतः पुंसः तेषु सङ्गः उपजायते, सङ्गात् कामः सञ्जायते, कामात् क्रोधः अभिजायते।
🇮🇳 हिन्दी-अनुवादः:
विषयों (भोग-विलास की वस्तुओं) का निरंतर चिंतन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति (लगाव) उत्पन्न हो जाती है। आसक्ति से काम (इच्छा) उत्पन्न होता है और इच्छा में बाधा पड़ने पर क्रोध उत्पन्न होता है।
📖 कठिन-शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| ध्यायतः | चिन्तनं कुर्वतः | चिंतन करने वाले का |
| पुंसः | मानवस्य / पुरुषस्य | मनुष्य का |
| सङ्गः | आसक्तिः / अनुरागः | लगाव / आसक्ति |
| उपजायते / सञ्जायते | उत्पद्यते | उत्पन्न होता है |
क्रोधाद्भवति संमोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥5॥
🎯 अन्वयः:
क्रोधात् सम्मोहः भवति, सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः (भवति), स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः (भवति), बुद्धिनाशात् (नरः) प्रणश्यति।
🇮🇳 हिन्दी-अनुवादः:
क्रोध से सम्मोह (अज्ञान/मूढ़ता) उत्पन्न होता है, सम्मोह से स्मरण शक्ति का भ्रम (विस्मरण) होता है, स्मरण शक्ति के नष्ट होने से बुद्धि (विवेक) का नाश होता है और बुद्धि का नाश होने से मनुष्य पूरी तरह नष्ट (पतित) हो जाता है।
📖 कठिन-शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| संमोहः | मूढता / अज्ञानम् | किंकर्तव्यविमूढ़ता / अज्ञान |
| स्मृतिविभ्रमः | स्मरणशक्तेः नाशः | यादाश्त का भ्रम/नष्ट होना |
| बुद्धिनाशः | विवेकस्य नाशः | सोचने-समझने की शक्ति का अंत |
| प्रणश्यति | पूर्णतः विनश्यति | पूरी तरह नष्ट हो जाता है |
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ!
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥6॥
🎯 अन्वयः:
भरतर्षभ! तस्मात् त्वम् आदौ इन्द्रियाणि नियम्य ज्ञानविज्ञाननाशनम् एनम् पाप्मानम् हि प्रजहि।
🇮🇳 हिन्दी-अनुवादः:
इसलिए हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! तुम सबसे पहले अपनी इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान (अनुभवजन्य ज्ञान) का नाश करने वाले इस पापी काम (इच्छा) का निश्चित रूप से त्याग करो।
📖 कठिन-शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| भरतर्षभ | भरतवंशे श्रेष्ठ! (अर्जुन) | हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! |
| आदौ | प्रथमम् | सबसे पहले |
| नियम्य | वशीकृत्य | वश में करके |
| प्रजहि | परित्यज / मारय | त्याग दो / नष्ट कर दो |
अर्जुन उवाच -
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥7॥
🎯 अन्वयः:
कृष्ण! मनः हि चञ्चलम् प्रमाथि बलवत् दृढम् (अस्ति), अहम् तस्य निग्रहम् वायोः इव सुदुष्करम् मन्ये।
🇮🇳 हिन्दी-अनुवादः:
अर्जुन बोले: हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा ही चंचल, मथ डालने वाला (उद्विग्न करने वाला), बलवान् और हठी है। इसलिए उसको वश में करना मैं वायु को रोकने के समान अत्यंत कठिन मानता हूँ।
📖 कठिन-शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| प्रमाथि | उद्वेगकारकम् | मथने वाला / उद्विग्न करने वाला |
| निग्रहम् | वशीकरणम् | रोकना / वश में करना |
| सुदुष्करम् | अत्यन्तं कठिनम् | अत्यंत कठिन |
श्रीभगवानुवाच -
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥8॥
🎯 अन्वयः:
महाबाहो! असंशयम् मनः चलम् दुर्निग्रहम् (अस्ति), तु कौन्तेय! (एतत्) अभ्यासेन वैराग्येण च गृह्यते।
🇮🇳 हिन्दी-अनुवादः:
श्रीभगवान् बोले: हे विशाल भुजाओं वाले अर्जुन! इसमें कोई संदेह नहीं कि चंचल मन को वश में करना कठिन है, परंतु हे कुंतीपुत्र! निरंतर अभ्यास और वैराग्य (अनासक्ति) के द्वारा इसे वश में किया जा सकता है।
📖 कठिन-शब्दार्थाः:
| कठिन-शब्दः | व्याकरणम् / पर्यायः | हिन्दी-अर्थः |
| असंशयम् | निःसन्देहम् | निःसंदेह / बिना संशय के |
| दुर्निग्रहम् | काठिन्येन वशीक्रियते यत् | कठिनाई से वश में होने वाला |
| गृह्यते | वशीक्रियते | वश में किया जाता है |
📝 अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि (NCERT Solutions)
1. एकपदेन संस्कृतभाषया उत्तरत (एक पद में उत्तर दीजिए):
(क) कामः कस्मात् सञ्जायते?
उत्तरम्: सङ्गात्
(ख) कीदृशः नरः सुखी भवति?
उत्तरम्: यः कामक्रोधोद्भवं वेगं सोढुं शक्नोति (युक्तः)
(ग) कामात् कः अभिजायते?
उत्तरम्: क्रोधः
(घ) कस्य निग्रहम् अर्जुनः वायोरिव सुदुष्करं मन्यते?
उत्तरम्: मनसः
(ङ) चञ्चलं मनः कथं गृह्यते?
उत्तरम्: अभ्यासेन वैराग्येण च
(च) पाठे 'वार्ष्णेय' इति पदं कस्मै प्रयुक्तम्?
उत्तरम्: श्रीकृष्णाय
2. पूर्णवाक्येन संस्कृतभाषया उत्तरत (पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए):
(क) रजोगुणसमुद्भवः कः अस्ति?
उत्तरम्: रजोगुणसमुद्भवः कामः क्रोधः च अस्ति।
(ख) क्रोधात् किं भवति?
उत्तरम्: क्रोधात् संमोहः भवति।
(ग) बुद्धिनाशात् किं भवति?
उत्तरम्: बुद्धिनाशात् पुरुषः प्रणश्यति।
(घ) कामस्य हननाय अर्जुनः किम् आदौ नियमयेत्?
उत्तरम्: कामस्य हननाय अर्जुनः आदौ इन्द्रियाणि नियमयेत्।
(ङ) मनः कीदृशं वर्तते?
उत्तरम्: मनः चञ्चलं, प्रमाथि, बलवत्, दृढं च वर्तते।
3. स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत:
(क) मनुष्यः कामेन प्रयुक्तः एव पापस्य आचरणं करोति।
प्रश्नः: मनुष्यः केन प्रयुक्तः एव पापस्य आचरणं करोति?
(ख) कामः एव क्रोधं जनयति।
प्रश्नः: कामः एव कम् जनयति?
(ग) काम एव अस्माकं शत्रुः।
प्रश्नः: काम एव अस्माकं कः?
(घ) यः क्रोधस्य वेगं जीवने सहते स सुखी नरः।
प्रश्नः: यः कस्य वेगं जीवने सहते स सुखी नरः?
(ङ) विषयाणाम् उपभोगेन तेषु आसक्तिः जायते।
प्रश्नः: केषाम् उपभोगेन तेषु आसक्तिः जायते?
(च) मनसः निग्रहः वायोः इव कठिनः।
प्रश्नः: मनसः निग्रहः कस्य इव कठिनः?
(छ) कामः ज्ञानविज्ञानाशनम् करोति।
प्रश्नः: कामः किम् करोति?
(ज) कामस्य नाशाय इन्द्रियाणि वशे करणीयानि।
प्रश्नः: कामस्य नाशाय कानि वशे करणीयानि?
4. अधोलिखितान् प्रश्नान् यथानिर्देशम् उत्तरत:
(क) 'अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।' अत्र किं क्रियापदं प्रयुक्तम् ? ➔ चरति
(ख) 'शरीरविमोक्षणात् प्राक् यः सोढुं शक्नोति।' अत्र 'पूर्वम्' इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम् ? ➔ प्राक्
(ग) 'चञ्चलं हि मनः कृष्ण!' अत्र किं विशेष्यपदम् ? ➔ मनः
(घ) 'सः युक्तः सः सुखी नरः' अस्मिन् वाक्ये 'योगी' इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम् ? ➔ युक्तः
(ङ) 'तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्' अत्र 'सुकरम्' इति पदस्य किं विलोमपदं प्रयुक्तम् ? ➔ सुदुष्करम्
(च) 'मनो दुर्निग्रहं चलम्' अत्र किं विशेषणपदम् अस्ति ? ➔ दुर्निग्रहम् / चलम्
5. विशेषण-विशेष्यपदानाम् उचितं मेलनं कुरुत:
- (क) सुखी ➔ नरः
- (ख) चञ्चलम् ➔ मनः
- (ग) कामक्रोधोद्भवम् ➔ वेगम्
- (घ) महाशनः ➔ कामः
6. प्रसङ्गानुसारं क्रियापदानाम् अर्थमेलनम् / चयनम्:
(क) विद्धि ➔ जानीहि
(ख) मन्ये ➔ अवगच्छामि
(ग) शक्नोति ➔ अर्हति / समर्थः भवति
(घ) गृह्यते ➔ वशीक्रियते
(ङ) प्रणश्यति ➔ विनश्यति
(च) प्रजहि ➔ विनाशय / परित्यज
7. श्लोकान्वय-पूर्तिः (रिक्तस्थानपूर्तिः):
अन्वयः: (क) वार्ष्णेय! अथ केन प्रयुक्तः अयम् पूरुषः अनिच्छन् अपि बलात् नियोजितः इव पापम् चरति।
(ख) रजोगुणसमुद्भवः एषः कामः एषः क्रोधः महाशनः महापाप्मा। एनम् इह वैरिणम् विद्धि।
8. भावार्थानुसारम् अशुद्धं कथनं चिनुत:
कथनम्: 'अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।'
❌ अशुद्धं कथनम्: (ग) सांसारिकभोगाः नश्वराः अतः एतेषां पुनः पुनः चिन्तनेन तेषु विरक्तिः जायते। (क्योंकि पुनः पुनः चिन्तन से विरक्ति नहीं बल्कि आसक्ति होती है।)
9. ग्राह्याणां फलानां (सद्गुणानाम्) नामानि लिखत:
✔ ग्राह्याणि फलानि: परोपकारः, सत्यम्, ज्ञानम्, शान्तिः, जागृतिः, पुण्यम्, सुस्मृतिः, विवेकः।
(त्याज्यानि फलानि: कामः, क्रोधः)