तृतीयः पाठः - रमणीया हि सृष्टिरेषा (Class 10 Sanskrit Manika Ch 3) | नाट्यांशार्थ , अन्वयः, शब्दार्थाः एवं अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि

तृतीयः पाठः • संस्कृतम्

रमणीया हि सृष्टिः एषा

एक रोचक संवाद-नाट्यांश — पक्षियों की कहानी जो सिखाती है कि सृष्टि का हर प्राणी सुंदर है

पूर्ण हिंदी अर्थ • कठिन शब्द • हल सहित अभ्यास

📖 पाठ का संक्षिप्त परिचय

यह एक संवाद-नाटिका (नाट्यांश) है, जिसका दृश्य एक सरोवर के किनारे प्रातःकाल का है। इसमें अलग-अलग पक्षी — राजहंस, राजहंसी, काक (कौवा), बक (बगुला), मयूर (मोर) और कोकिल (कोयल) — आपस में यह सिद्ध करने की होड़ में लग जाते हैं कि उनमें से सबसे श्रेष्ठ कौन है। अंत में प्रकृति माता स्वयं आकर सबको समझाती है कि सृष्टि में हर प्राणी का अपना महत्त्व है, और जब सब मिलजुल कर रहते हैं तभी यह सृष्टि सच में रमणीय (सुंदर) बनती है।

राजहंस-राजहंसीस्वयं को विवेकी राजा मानते हैं
काकस्वयं को कर्तव्यपरायण बताता है
बकस्वयं को ध्यानी/स्थितप्रज्ञ कहता है
मयूरस्वयं को राष्ट्रपक्षी और सुंदरतम बताता है
कोकिलस्वयं को मधुर स्वर वाली बताती है
प्रकृतिसबकी जननी, अंत में सबको समझाती है

📜 पाठ — अनुच्छेदवार हिंदी अर्थ

1

दृश्यारंभ — राजहंस-राजहंसी का प्रारंभिक संवाद

[स्थानम् - सरस्तीरम्! समयः - प्रभातवेला। तत्र राजहंसः हंसी च विहरतः। नेपथ्ये काकध्वनिः श्रूयते।]
राजहंसः - अये! किन्तु खलु सरस्तीरे विहरति मयि केनापि कर्कशैः 'का का' शब्दैः वातावरणम् आकुलीक्रियते?
राजहंसी - भर्तः! काकात् अन्यः को भवितुमर्हति? अस्य वर्णः अपि कृष्णः, कर्म अपि कृष्णम्। मेध्यम् अमेध्यं सर्वमेव भक्षयति। कर्णकटुशब्दैः - - -

दृश्य का आरंभ सरोवर के किनारे प्रातःकाल की सुहावनी बेला में होता है, जहाँ राजहंस और राजहंसी विचरण कर रहे हैं। तभी परदे के पीछे से कौवे की कर्कश आवाज़ सुनाई देती है। राजहंस झुँझलाकर कहता है — "अरे! आज सरोवर के तट पर विचरण करते समय किसी कर्कश (कठोर स्वर वाले) पक्षी की 'का-का' ध्वनि से पूरा वातावरण व्याकुल हो उठा है!" राजहंसी उत्तर देती है — "स्वामी! कौवे के अलावा और कौन इतना कर्कश हो सकता है? इसका रंग भी काला है और कर्म भी काला (बुरा)। यह शुद्ध-अशुद्ध सब कुछ खा जाता है और अपनी कानों को चुभने वाली आवाज़ से..."

कर्कशैः — कठोर/निष्ठुर स्वरों वाला
आकुलीक्रियते — व्याकुल किया जाता है
मेध्यम्/अमेध्यम् — शुद्ध/अशुद्ध
नेपथ्यम् — परदे के पीछे का भाग
2

काक का क्रोधित प्रवेश और अपना बचाव

काकः - (प्रविश्य, सक्रोधम्) आ:! किम् उक्तवती भवती? यदि अहं कृष्णवर्णः तर्हि श्रीरामस्य वर्णः कीदृशः? श्रीवासुदेवस्य वर्णः कीदृशः? मुग्धे! अहं तु अतीव कर्तव्यपरायणः। प्रभाते 'का-का' ध्वनिना सुषुप्तान् प्रबोधयामि कर्मसु च विनियोजयामि।

यह सुनकर कौवा क्रोध में भरकर वहाँ आ जाता है और कहता है — "अरे! तुमने यह क्या कह दिया? यदि मैं काले रंग का हूँ, तो भगवान श्रीराम का रंग कैसा है (वे भी श्याम वर्ण के थे)? श्रीकृष्ण का रंग कैसा है? मूर्ख! मैं तो अत्यंत कर्तव्यपरायण हूँ। मैं ही प्रातःकाल 'का-का' की ध्वनि से सोए हुए लोगों को जगाकर उन्हें उनके काम में लगाता हूँ।"

सक्रोधम् — क्रोध सहित
प्रबोधयामि — जगाता हूँ
विनियोजयामि — (कार्य में) लगाता हूँ
3

राजहंस का ताना और काक का मुर्गे वाला जवाब

राजहंसः - हुं! किमनेन? एतत् कार्यं तु कुक्कुटोऽपि करोति।
काकः - (विहस्य) कुक्कुटः। अरे अद्य कुतः कुक्कुटाः नगरेषु। अहमेव सर्वत्र सुलभः।

राजहंस व्यंग्य से कहता है — "हुंह! इसमें क्या बड़ी बात है? यह काम तो मुर्गा भी कर सकता है!" इस पर कौवा हँसते हुए (उपहास करते हुए) कहता है — "मुर्गा! अरे, मुर्गे तो आजकल शहरों में कहीं-कहीं ही मिलते हैं, जबकि मैं तो हर जगह सहज ही उपलब्ध हूँ।"

विहस्य — हँसकर
सुलभः — आसानी से मिलने वाला
4

राजहंसी की फटकार और काक का आत्म-गौरव भरा उत्तर

राजहंसी - भोः भोः वाचाल! स्वीयैः कटुभिः क्वणितैः जनजागरणात् अन्यत् तु किमपि न करोषि?
काकः - अहो अज्ञानं भवत्याः! अरे! यस्य गृहस्य भित्तौ स्थित्वा आलपामि, जनाः प्रियस्य आगमनसङ्केतं मत्वा हृष्यन्ति। किं बहुना! अहं तु एतादृशः सत्यप्रियः यत् मातरः शिशून् कथयन्ति- "अनृतं वदसि चेत् काकः दशेत्।" अस्माकम् ऐक्यं तु जगत्प्रसिद्धम्। सर्वथा जागरूकोऽहं छात्राणां कृते आदर्शः एव। किं न श्रुतं काकचेष्टा, बकध्यानम् - - -

राजहंसी झुँझलाकर कहती है — "अरे बातूनी! अपनी कर्णकटु बोली से लोगों को जगाने के अलावा और कुछ करते भी हो क्या?" कौवा उत्तर देता है — "अफ़सोस है तुम्हारी अज्ञानता पर! अरे, जिसके घर के आँगन में बैठकर मैं बोलता हूँ, लोग समझते हैं कि उनके प्रियजन के आने का शुभ संकेत मिला है और वे प्रसन्न हो जाते हैं। मैं तो इतना सत्यप्रिय हूँ कि माताएँ अपने बच्चों को सिखाती हैं — 'यदि झूठ बोलोगे तो कौआ काट लेगा।' हम कौवों की यह एकता जगत्प्रसिद्ध है। मैं सदा जागरूक रहकर विद्यार्थियों के लिए एक आदर्श हूँ। क्या तुमने 'काकचेष्टा' और 'बकध्यान' के बारे में नहीं सुना...?"

वाचाल — बातूनी
प्राङ्गणम् — आँगन
अनृतम् — असत्य, झूठ
ऐक्यम् — एकता
काकचेष्टा — कौवे जैसी सक्रियता
5

राजहंस के दो प्रसिद्ध श्लोक

राजहंसः - विरम विरम! श्रूयतां यत् जनैः सर्वदा गीयते तव विषये—
काकस्य गात्रं यदि काञ्चनस्य माणिक्यरत्नं यदि चञ्चुदेशे। एकैकपक्षे ग्रथितं मणीनां तथापि काको न तु राजहंसः॥1॥
हंसः श्वेतः बकः श्वेतः को भेदः बकहंसयोः। नीरक्षीरविवेके तु हंसो हंसः बको बकः॥2॥

श्लोक 1 का अर्थ: यदि कौवे का पूरा शरीर सोने का बन जाए और उसकी चोंच में मणि जड़ी हो, यहाँ तक कि उसके एक-एक पंख में भी मणियाँ गूँथ दी जाएँ, तब भी वह कौआ ही कहलाएगा, राजहंस नहीं — अर्थात् बाहरी सजावट से किसी की मूल प्रकृति नहीं बदल जाती।
श्लोक 2 का अर्थ: हंस भी सफ़ेद होता है और बगुला भी सफ़ेद होता है, फिर दोनों में क्या भेद है? नीर-क्षीर विवेक (दूध-पानी अलग करने जैसी सूक्ष्म बुद्धि) में हंस ही हंस कहलाता है, जबकि बगुला तो बगुला ही रहता है — अर्थात् केवल रूप-रंग से नहीं, आंतरिक गुण से ही असली पहचान बनती है।

ग्रथितम् — गुँथा हुआ
चञ्चुदेशे — चोंच के हिस्से में
नीरक्षीरविवेके — विवेचनात्मक/सूक्ष्म बुद्धि में
6

बक (बगुले) का प्रवेश और आत्मप्रशंसा

बकः - (प्रविश्य, स्वपक्षौ अवधूय) कथं माम् अपि अधिक्षिपसि? किं ते महत्त्वम्? वर्षर्तौ तु मानसं पलायसे। अहम् एव अत्र वृष्टेः अभिनन्दनं करोमि। कीदृशी तव मैत्री? आपत्काले सरांसि त्यक्त्वा दूरं व्रजसि। वस्तुतः अहमेव शीतले जले बहुकालपर्यन्तम् अविचलं ध्यानमग्नः 'स्थितप्रज्ञ' इव तिष्ठामि। दुग्धधवला मे पक्षाः। न जाने कथं माम् अपरिगणयन्तः जनाः चित्रवर्णम् अहिभुजं मयूरं 'राष्ट्रपक्षी' इति मन्यन्ते। अहमेव योग्यः - - - - -

राजहंस की बात सुनकर बगुला अपने पंख फड़फड़ाते हुए क्रोध से प्रवेश करता है और कहता है — "तुमने मेरा भी अपमान क्यों किया? तुम्हारी योग्यता ही क्या है? वर्षा ऋतु में तो तुम मानसरोवर छोड़कर दूर भाग जाते हो, जबकि मैं तो ठंडे पानी में लंबे समय तक बिना हिले-डुले, ध्यानमग्न होकर 'स्थितप्रज्ञ' मुनि की तरह बैठा रहता हूँ। मेरे पंख दूध जैसे उजले हैं। न जाने क्यों लोग मुझे न पहचानकर विचित्र रंगों वाले, साँप खाने वाले मोर को ही 'राष्ट्रपक्षी' मान बैठे हैं। असली योग्य तो मैं ही हूँ..."

अवधूय — हिलाकर, फड़फड़ाकर
स्थितप्रज्ञः — स्थिरबुद्धि, निश्चित बुद्धि वाला
अहिभुजम् — साँप खाने वाले (गरुड़/मोर) को
7

मयूर का हँसते हुए प्रवेश और काक-मयूर की नोकझोंक

मयूरः - (प्रविश्य साट्टहासम्) सत्यं सत्यम्। अहमेव राष्ट्रपक्षी। कः न जानाति तव ध्यानावस्थाम्? मौनं धृत्वा वराकान् मीनान् छलेन अधिगृह्य क्रूरतया भक्षयसि। धिक् त्वाम्! अवमानितं खलु सर्वं पक्षिकुलं त्वया।
काकः - रे सर्पभक्षक! नर्तनात् अन्यत् किम् अपरं जानासि?

यह सुनकर मोर ज़ोर से हँसते हुए प्रवेश करता है और कहता है — "सच में! सच में! राष्ट्रपक्षी तो मैं ही हूँ। मेरी ध्यान-अवस्था को भला कौन जानता है? तुम तो चुप्पी साधकर बेचारी मछलियों को छल से पकड़कर क्रूरतापूर्वक खा जाते हो। धिक्कार है तुम पर! तुमने तो सारे पक्षी-समुदाय का अपमान कर दिया है।" इस पर कौवा ताना मारता है — "अरे साँप खाने वाले! नाचने के अलावा और कुछ जानते भी हो क्या?"

साट्टहासम् — ज़ोर से हँसते हुए
वराकान् — बेचारों को, अभागों को
अधिगृह्य — पकड़कर
8

मोर अपनी सुंदरता का वर्णन करता है

मयूरः - श्रूयतां श्रूयताम्! मम नृत्यं तु प्रकृतेः आराधना। पश्य! चारुवर्तुलचन्द्रिकाशोभितानां मम पिच्छानाम् अपूर्वं सौन्दर्यम्। मम केकारवं श्रुत्वा कोकिलः अपि लज्जते। मम शिरसि राजमुकुटमिव शिखां स्थापयता विधात्रा एव अहं पक्षिराजः कृतः।

मोर उत्तर देता है — "सुनो, सुनो! मेरा नृत्य तो स्वभाव से ही प्रकृति की आराधना है। देखो, मेरे पंखों की सुंदरता अद्भुत है — सुंदर, गोल, अर्धचंद्राकार चंद्रकलाओं से सुशोभित। मेरी मधुर 'केका' ध्वनि सुनकर तो कोयल भी लजा जाती है। ब्रह्मा (विधाता) ने स्वयं मेरे सिर पर राजमुकुट जैसी शिखा (कलंगी) लगाकर मुझे पक्षियों का राजा बनाया है।"

पिच्छानाम् — मोर-पंखों का
चारुवर्तुलचन्द्रिकाशोभितानाम् — सुंदर गोलार्ध चंद्राकार से सुशोभितों के
केकारवम् — मोर की आवाज़ को
9

कोकिल का प्रवेश और तीसरा श्लोक

कोकिलः - (प्रविश्य) रे मयूर! अलम् अतिविकत्थनेन। मधुमासे आम्रवृक्षे स्थित्वा यदा अहं पञ्चमस्वरेण गायामि तदा श्रोतारः कथयन्ति-
काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः।
वसन्तसमये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः॥3॥

काकः - रे परभृत्! अहं यदि तव सन्ततिं न पालयामि तर्हि कुत्र स्युः पिकाः? अतः अहम् एव करुणापरः पक्षिसम्राट् काकः!

यह सुनकर कोयल प्रवेश करती है और मोर को टोकते हुए कहती है — "अरे मोर! बहुत हो गई आत्मप्रशंसा, अब रुक जाओ। जब मैं बसंत ऋतु में आम के पेड़ पर बैठकर पंचम स्वर में गाती हूँ, तब सुनने वाले लोग कहते हैं — श्लोक 3 का अर्थ: 'कौआ भी काला है और कोयल भी काली है, तो फिर कौवे और कोयल में क्या अंतर है? यह भेद तो बसंत ऋतु में ही पता चलता है — तब काक काक ही रहता है और कोयल, कोयल ही सिद्ध होती है।' अर्थात् असली गुण संकट या विशेष अवसर पर ही प्रकट होता है। इस पर कौआ बोलता है — "अरे कोयल! यदि मैं तुम्हारी संतान का पालन-पोषण न करूँ, तो कोयल के बच्चे कहाँ पैदा होंगे (क्योंकि कोयल अपने अंडे कौवे के घोंसले में देती है)? इसलिए मैं ही सबसे दयालु और पक्षियों का सच्चा सम्राट् हूँ!"

परभृत् — दूसरों द्वारा पालित (कोयल)
पञ्चमस्वरेण — सरगम के पाँचवें सुर से
विकत्थनेन — आत्मप्रशंसा से
10

राजहंस-बक का अंतिम दावा और प्रकृति माता का प्रवेश

राजहंसः - शान्तं शान्तम्। अहमेव नीरक्षीरविवेकी पक्षिणां राजा!
बकः - धिक् युष्मान्! अहमेव सर्वशिरोमणिः!
(ततः प्रकृतिमाता प्रविशति)

राजहंस बीच में टोककर कहता है — "शांत हो जाओ, शांत हो जाओ! नीर-क्षीर का विवेक रखने वाला राजा तो मैं ही हूँ!" बगुला भी अपना दावा नहीं छोड़ता — "तुम सबको धिक्कार है, सबसे श्रेष्ठ तो मैं ही हूँ!" इसी बीच सब आपस में झगड़ ही रहे थे कि प्रकृति माता वहाँ प्रवेश करती है।

वरिष्ठः — सर्वोत्तम
कनिष्ठः — सबसे छोटा
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प्रकृति माता का उपदेश और अंतिम दो श्लोक

प्रकृतिः - (स्नेहम्) अलम् अलं मिथः कलहेन।... आयुषः क्षण एकोऽपि न लभ्यः स्वर्णकोटिकैः। स चेन्निरर्थकं नीतः का नु हानिस्ततोऽधिका॥4॥
अधुना रमणीया हि सृष्टिरेषा जगत्पते। जीवाः सर्वेऽत्र मोदन्तां भावयन्तः परस्परम्॥5॥

प्रकृति स्नेहपूर्वक सबको समझाती है — "बस करो, बस करो, आपस का यह झगड़ा बंद करो। मैं ही प्रकृति हूँ, तुम सबकी जननी हूँ। तुम सब ही मुझे प्रिय हो। हर किसी का अपने-अपने समय पर महत्त्व होता है। तुम सब से ही मेरी शोभा है। व्यर्थ के कलह में समय नष्ट मत करो, मिलजुलकर आनंद मनाओ और जीवन को रसमय बनाओ।" तब सभी पक्षी मिलकर गाते हैं — श्लोक 4 का अर्थ: "आयु का एक भी क्षण करोड़ों स्वर्ण-मुद्राओं से भी नहीं खरीदा जा सकता। यदि वह क्षण व्यर्थ में बीत जाए, तो इससे बड़ी हानि और क्या हो सकती है?" श्लोक 5 का अर्थ: "हे जगत्पते! यह सृष्टि अब वास्तव में रमणीय (सुंदर) प्रतीत हो रही है, जब सभी जीव आपस में एक-दूसरे के प्रति सद्भावना रखते हुए आनंदित हो रहे हैं।" इस प्रकार सभी पक्षी अपना आपसी झगड़ा भुलाकर मिलजुल कर रहने का संदेश स्वीकार करते हैं, और नाटक का सुखद अंत होता है।

भावयन्तः — सद्भावना रखते हुए
यापयेत् — बिताए
आयुषः — आयु का
रमणीया — मनोहारी, सुंदर

🌸 पाठ की शिक्षा

यह पाठ हमें सिखाता है कि सृष्टि का हर प्राणी अपने-अपने गुणों के कारण महत्त्वपूर्ण है। किसी को छोटा या बड़ा समझकर आपस में लड़ना व्यर्थ है। सबको मिलजुल कर, एक-दूसरे का सम्मान करते हुए जीवन बिताना चाहिए — तभी यह सृष्टि सचमुच रमणीय (सुंदर) बनती है।

📚 सम्पूर्ण शब्दार्थाः (कठिन शब्द)

शब्दहिंदी अर्थ
अधिक्षिपसिअपमानित करते हो
अधिगृह्यपकड़कर
अनृतम्असत्य, झूठ
अपरिगणयन्तःन मानते हुए
अमेध्यम्अशुद्ध, अपवित्र
श्रूयताम्सुनिए
अवधूयहिला करके
अवमानितम्अपमानित किया गया
अहिभुजम्गरुड़ को / साँप खाने वाले को
आकुलीक्रियतेव्याकुल किया जाता है
आयुषःआयु का
ऐक्यम्एकता, समरूपता
कनिष्ठःसबसे छोटा
कर्कशःक्रूर, कठोर
काकचेष्टाकौवे जैसी सक्रियता
केकारवम्मोर की आवाज़ को
क्वणितैःअस्पष्ट स्वरों से
गात्रम्शरीर
ग्रथितम्गुँथा हुआ
चञ्चुदेशेचोंच के हिस्से में
चारुवर्तुलचन्द्रिकाशोभितानाम्सुंदर गोलार्ध चंद्राकार से सुशोभितों के
नीरक्षीरविवेकेसूक्ष्मबुद्धि, विवेचनात्मक बुद्धि
नेपथ्यम्परदे के पीछे का भाग
पञ्चमस्वरेणसरगम का पाँचवाँ सुर
परभृत्दूसरों द्वारा पालित (कोयल)
पलायसेभागते हो
पिच्छानाम्मोर पंखों का
प्रबोधयामिजगाता हूँ
प्राङ्गणम्आँगन
भावयन्तःसद्भावना रखते हुए
मिथःआपस में
मेध्यम्शुद्ध, स्वच्छ
यापयेत्बिताएँ
रमणीयाआनंदप्रदा, मनोहारी
वराकान्दयनीय, बेचारों को
वरिष्ठःसर्वोत्तम, अत्यंत श्रेष्ठ
वाचालबातूनी, प्रगल्भ
विकत्थनेनआत्मप्रशंसा के द्वारा
विहस्यहँसकर
सृष्टिःविश्व, संसार की रचना
स्थितप्रज्ञःस्थिरबुद्धि, निश्चित बुद्धि वाला

✍️ अभ्यासः — हल सहित प्रश्नोत्तर

1. आम्/नहि में उत्तर दीजिए

(क) किं 'का का' इति राजहंसस्य ध्वनिः?
नहि — यह काक (कौवे) की ध्वनि है, राजहंस की नहीं।
(ख) किं काकः मेध्यम् अमेध्यं वा सर्वमेव भक्षयति?
आम् — काक शुद्ध-अशुद्ध सब कुछ खा जाता है।
(ग) किं कुक्कुटाः नगरेषु सर्वत्र सुलभाः एव?
नहि — काक के अनुसार मुर्गे कहीं-कहीं ही मिलते हैं, जबकि काक हर जगह सुलभ है।
(घ) किं राजहंसी श्लोकद्वयं पठति?
नहि — श्लोकद्वय राजहंस पढ़ता है, राजहंसी नहीं।
(ङ) किं बकः श्वेतः भवति?
आम् — बक (बगुला) श्वेत रंग का होता है।
(च) किं वर्षाणाम् अभिनन्दनं बकः करोति?
आम् — बक वर्षा ऋतु में जल में रहकर उसका अभिनंदन करता है।
(छ) किं मयूरः एव अस्माकं राष्ट्रपक्षी?
आम् — मयूर ही हमारा राष्ट्रपक्षी है।
(ज) किं मयूरः क्रोधेन प्रविशति?
नहि — मयूर हँसते हुए (साट्टहासम्) प्रवेश करता है, क्रोध से नहीं।
(झ) किं कोकिलः एव मधुमासे आम्रवृक्षे स्थित्वा गायति?
आम् — कोकिल ही बसंत में आम के पेड़ पर बैठकर गाती है।
(ञ) किं राजहंसः एव नीरक्षीरविवेकी मन्यते?
आम् — राजहंस स्वयं को नीरक्षीरविवेकी मानता है।

2. पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए

(क) राजहंसः राजहंसी च काकध्वनिं कस्यां वेलायां शृणुतः?
राजहंसः राजहंसी च काकध्वनिं प्रभातवेलायां शृणुतः।
(ख) मयूरः केन पक्षिराजः कृतः?
मयूरः विधात्रा (ब्रह्मा द्वारा) पक्षिराजः कृतः।
(ग) कोकिलः कुत्र स्थित्वा पञ्चमस्वरेण गायति?
कोकिलः मधुमासे आम्रवृक्षे स्थित्वा पञ्चमस्वरेण गायति।
(घ) मातरः शिशून् किं कथयन्ति?
मातरः शिशून् कथयन्ति यत् "अनृतं वदसि चेत् काकः दशेत्।"
(ङ) केषाम् ऐक्यं जगत्प्रसिद्धम्?
काकानां (कौवों का) ऐक्यं जगत्प्रसिद्धम्।
(च) काकपिकयोः भेदः कदा ज्ञायते?
वसन्तसमये (जब कोयल कूकती है, तब) काकपिकयोः भेदः ज्ञायते।
(छ) कीदृशी सृष्टिः एषा?
एषा सृष्टिः रमणीया (अत्यंत सुंदर) अस्ति।
(ज) केन समयः वृथा न यापयितव्यः?
कलहेन (आपसी झगड़े से) समयः वृथा न यापयितव्यः।

3. स्थूलपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणम्

(क) नेपथ्ये काकध्वनिः श्रूयते।
कुत्र काकध्वनिः श्रूयते?
(ख) काकः प्रभाते 'का का' ध्वनिना सुप्तान् प्रबोधयति।
काकः प्रभाते 'का का' ध्वनिना कान् प्रबोधयति?
(ग) मयूरस्य पिच्छानां सौन्दर्यम् अद्भुतम् अस्ति।
कस्य पिच्छानां सौन्दर्यम् अद्भुतम् अस्ति?
(घ) बकः मीनान् छलेन अधिगृह्य क्रूरतया भक्षयति।
बकः मीनान् छलेन अधिगृह्य कथं भक्षयति?
(ङ) जगत्पते! एषा सृष्टिः रमणीया अस्ति।
जगत्पते! एषा सृष्टिः कीदृशी अस्ति?
(च) मयूरस्य नृत्यं प्रकृतेः आराधना।
कस्य नृत्यं प्रकृतेः आराधना?
(छ) आयुषः एकः अपि क्षणः स्वर्णकोटिकैः न लभ्यते।
कस्य एकः अपि क्षणः स्वर्णकोटिकैः न लभ्यते?
(ज) हंसः वर्षर्तौ तु मानसं पलायते।
हंसः कस्मिन् ऋतौ मानसं पलायते?

4. यथानिर्देशम् उत्तरत

(क) 'जनाः प्रियस्य आगमनसङ्केतं मत्वा हृष्यन्ति।' कर्तृपदम् किम् अस्ति?
कर्तृपदम् — जनाः
(ख) 'अलम् अलं मिथः कलहेन।' वाक्येऽस्मिन् 'परस्परम्' इति पदस्य किं पर्यायपदम् प्रयुक्तम्?
पर्यायपदम् — मिथः
(ग) 'आपत्काले सरांसि त्यक्त्वा दूरं व्रजसि।' वाक्येऽस्मिन् किं क्रियापदम् प्रयुक्तम्?
क्रियापदम् — व्रजसि
(घ) 'सत्यम्' इति पदस्य किं विलोमपदं पाठे प्रयुक्तम्?
विलोमपदम् — अनृतम्
(ङ) 'दुग्धधवलाः।' इति विशेषणपदस्य किं विशेष्यपदं पाठे प्रयुक्तम्?
विशेष्यपदम् — पक्षाः (मे पक्षाः)
(च) 'पिच्छानाम्' इति पदस्य विशेषणपदं पाठात् चित्वा लिखत।
विशेषणपदम् — मयूरस्य
(छ) 'विचित्रा खलु दैवगतिः।' अत्र विशेष्यपदं किम् अस्ति?
विशेष्यपदम् — दैवगतिः

5. समुचित पर्यायपद लिखिए

(क) असत्यम्
अनृतम्
(ख) शरीरम्
गात्रम्
(ग) गृहीत्वा
अधिगृह्य
(घ) प्रातःकालः
प्रभातवेला
(ङ) प्रसीदन्ति
हृष्यन्ति

6. उदाहरणानुसार रिक्तस्थानपूर्तिः (कस्मै कथयति)

यथा (क) राजहंसी राजहंसं कथयति यत् काकस्य कर्म अपि कृष्णम्।
(पहले से हल)
(ख) काकः ______ कथयति यत् यदि सः कृष्णवर्णः तर्हि श्रीरामस्य वर्णः कीदृशः?
काकः राजहंसीं कथयति...
(ग) राजहंसः ______ कथयति यत् एतत् कार्यं तु कुक्कुटोऽपि करोति।
राजहंसः काकं कथयति...
(घ) बकः ______ कथयति यत् तस्य किं महत्त्वम्?
बकः राजहंसं कथयति...
(ङ) मयूरः ______ कथयति यत् तस्य ध्यानावस्थां को न जानाति?
मयूरः काकं कथयति...
(च) कोकिलः ______ कथयति यत् अलम् 'अतिविकत्थनेन'।
कोकिलः मयूरं कथयति...
(छ) काकः ______ कथयति यत् सः एव करुणापरः पक्षिसम्राट्!
काकः कोकिलं कथयति...

7. अधोलिखितेषु वाक्येषु समुचितं पदं लिखत

यथा (क) राजहंसः काकस्य ध्वनिं श्रुत्वा व्याकुलः भवति।
(पहले से हल)
(ख) काकः ______ कथनं श्रुत्वा तु क्रुद्धः भवति परं ______ वचनं श्रुत्वा विहसति।
काकः राजहंस्याः कथनं श्रुत्वा क्रुद्धः भवति परं राजहंसस्य वचनं श्रुत्वा विहसति।
(ग) राजहंसी ______ वचनं श्रुत्वा तं 'वाचाल' इति कथयति।
राजहंसी काकस्य वचनं श्रुत्वा...
(घ) मयूरः ______ वचांसि श्रुत्वा प्रविशति।
मयूरः बकस्य वचांसि श्रुत्वा प्रविशति।
(ङ) कोकिलः ______ वाचांसि श्रुत्वा प्रविशति।
कोकिलः मयूरस्य वाचांसि श्रुत्वा प्रविशति।
(च) अन्ते ______ प्रविशति।
प्रकृतिः प्रविशति।

8. पाठगतश्लोकानां भावस्पष्टीकरणम्

(क) यदि ______ चञ्चुदेशे माणिक्यरत्नम् अपि भवेत् तथापि सः ______ न मन्यते अपितु ______ एव।
यदि काकस्य गात्रं काञ्चनस्य चञ्चुदेशे माणिक्यरत्नम् भवेत् तथापि सः राजहंसः न मन्यते अपितु काकः एव। एवमेव यदि बकस्य पक्षाः मणिभिः ग्रथिताः भवेयुः तथापि सः राजहंसः एव न भवति
(ख) हंसः श्वेतवर्णः बकस्य अपि च वर्णः ______ एव। अतः बकहंसयोः वर्णदृष्ट्या कोऽपि न भेदः, परं ______ एव विवेकशील मन्यते, न तु ______।
वर्णः श्वेतः एव। परं हंसः एव विवेकशील मन्यते, न तु बकः
(ग) काकस्य वर्णः कृष्णः ______ अपि वर्णः ______। एतयोः भेदः तु ______ एव ज्ञायते यत् काकः ______ पिकः च पिकः अस्ति।
काकस्य वर्णः कृष्णः पिकस्य अपि वर्णः कृष्णः। एतयोः भेदः तु वसन्तसमये एव ज्ञायते यत् काकः काकः पिकः च पिकः अस्ति।

9. सर्वनामपदानि 'कस्मै प्रयुक्तानि' इति लिखत

यथा - सर्वथा जागरूकः अहम्।
काकाय
(क) सरस्तीरे विहरति मयि।
राजहंसाय
(ख) कथं माम् अधिक्षिपसि?
बकाय
(ग) अहम् एव वृष्टेः अभिनन्दनं करोमि।
बकाय
(घ) मम नृत्यं तु प्रकृतेः आराधना।
मयूराय
(ङ) अहं पञ्चमस्वरेण गायामि।
कोकिलाय
(च) अहमेव सर्वशिरोमणिः।
बकाय
(छ) सर्वैः एव मे शोभा।
प्रकृत्यै
(ज) अहमेव नीरक्षीरविवेकी।
राजहंसाय

10. केन कथितानि एतानि कथनानि? (वक्ता बताइए)

(क) अहं तु अतीव कर्तव्यपरायणः।
वक्ता — काकः
(ख) नीरक्षीरविवेके तु हंसो हंसः बको बकः।
वक्ता — राजहंसः
(ग) दुग्धधवलाः मे पक्षाः।
वक्ता — बकः
(घ) अहमेव सर्वशिरोमणिः।
वक्ता — बकः
(ङ) सर्वेषामेव महत्त्वं विद्यते यथासमयम्।
वक्ता — प्रकृतिः

11. समस्तपदैः रिक्तस्थानानि पूरयत

(क) राजहंसः हंसी च (सरसः तीरे) ______ विहरतः।
सरस्तीरे
(ख) तत्र (काकस्य ध्वनिः) ______ अपि श्रूयते।
काकध्वनिः
(ग) काकः (क्रोधेन सहितम्) ______ प्रविशति।
सक्रोधम्
(घ) काकः आत्मानं (सत्यं प्रियं यस्य तम्) ______ कथयति।
सत्यप्रियम्
(ङ) काकस्य चञ्चुदेशे (माणिक्यानि च रत्नानि च तेषां समाहारः) ______ भवेत् तथापि सः राजहंसः न भवति।
माणिक्यरत्नम्
(च) बकः (स्थिता प्रज्ञा यस्य सः) ______ इव जले बहुकालपर्यन्तं तिष्ठति।
स्थितप्रज्ञः
(छ) (समयम् अनतिक्रम्य) ______ सर्वेषां महत्त्वं विद्यते।
यथासमयम्

12. स्थूलाक्षरपदानां प्रसङ्गानुसारम् उचितम् अर्थं चित्वा लिखत

(क) मेध्यम् अमेध्यं सर्वमेव भक्षयति। — (i) मेधाविनम् (ii) अभक्षणीयम् (iii) विशुद्धम्
सही उत्तर — (iii) विशुद्धम्
(ख) अस्माकम् ऐक्यं तु जगत्प्रसिद्धम्। — (i) एकता (ii) भिन्नता (iii) क्रूरता
सही उत्तर — (i) एकता
(ग) काकस्य गात्रं यदि काञ्चनस्य। — (i) गोत्रम् (ii) कुटुम्बम् (iii) शरीरम्
सही उत्तर — (iii) शरीरम्
(घ) आपत्काले सरांसि त्यक्त्वा दूरं व्रजसि। — (i) वदसि (ii) भजसि (iii) गच्छसि
सही उत्तर — (iii) गच्छसि
(ङ) बकः मीनान् छलेन अधिगृह्य क्रूरतया भक्षयति। — (i) गृहीत्वा (ii) खादित्वा (iii) त्यक्त्वा
सही उत्तर — (i) गृहीत्वा

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